गाड़ी में साथ बैठे हुए, उसके भाई ने अचानक उस पर हमला कर दिया।
मेरा नाम दिव्या है। मैं 22 साल की हूँ, झारखंड के धनबाद की रहने वाली। गोरी, लंबी, और मेरी फिगर 34-28-36 है, जिसे देखकर लोग आहें भरते हैं। मेरी बड़ी-बड़ी चूचियाँ और गोल-मटोल गांड हमेशा लोगों का ध्यान खींचती है। मेरा भाई, राहुल, 25 साल का है, दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहता है। वो लंबा, हट्टा-कट्टा, और गठीला है, चेहरा ऐसा कि लड़कियाँ उस पर फिदा हो जाएँ। उसका रंग थोड़ा सांवला है, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक है जो किसी को भी अपनी ओर खींच लेती है। मैं दिल्ली जा रही थी क्योंकि मेरा दाखिला नोएडा के एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में हो गया था। राहुल मुझे लेने धनबाद आया था, और हम दोनों राजधानी एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास AC कोच में दिल्ली के लिए रवाना हुमेरे पापा सरकारी अफसर हैं, तो हमें फर्स्ट क्लास का टिकट आसानी से और सस्ते में मिल गया। फर्स्ट क्लास AC में प्राइवेसी तो बनती ही है। हमारे केबिन में सिर्फ हम दोनों थे। दरवाजा बंद, खिड़की पर पर्दे, और बाहर ट्रेन की सरसराहट। माहौल ऐसा था कि कुछ न कुछ तो होना ही था।ट्रेन शाम को चली थी। हमने अपना सामान सेट किया और अपनी-अपनी बर्थ पर बैठ गए। मैं मोबाइल में एक सेक्सी भाई-बहन की चुदाई की कहानी पढ़ रही थी। कहानी इतनी गर्म थी कि मेरी साँसें तेज होने लगीं, और चूत में हल्की सी गीलापन महसूस होने लगा। मैंने चुपके से राहुल की तरफ देखा। वो भी मोबाइल में कुछ पढ़ रहा था। मैंने झाँककर देखा तो हैरान रह गई - वो भी उसी वेबसाइट पर भाई-बहन की चुदाई की कहानी पढ़ रहा था! मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गईं। मैंने सोचा, अगर वो ऐसी कहानियाँ पढ़ रहा है, तो जरूर बिंदास और सेक्सी होगा। मेरे दिमाग में लड्डू फूटने लगे। मैंने सोचा, काश आज रात कुछ हो जाए… कुछ ऐसा, जो ट्रेन के इस बंद केबिन में हमें और करीब ला दे।
मैं ख्यालों में खोई थी कि तभी राहुल ने टोका, “क्या सोच रही हो, दिव्या?” मैं चौंक गई। मेरे मुँह से निकला, “क… कुछ नहीं, बस ऐसे ही!” लेकिन वो बार-बार पूछने लगा, “बता ना, क्या बात है? कुछ तो है!” मैं घबरा रही थी, लेकिन उसकी जिद के आगे हार गई। मैंने हिम्मत जुटाकर कहा, “तुम्हारे बारे में सोच रही थी… कि काश मेरा पति भी तुम जैसा हो। हॉट, सेक्सी, और…” मैंने बात अधूरी छोड़ दी। वो हँस पड़ा, लेकिन उसकी आँखों में एक अलग सी चमक थीट्रेन तेजी से भाग रही थी। बाहर अंधेरा हो चुका था। टीटी टिकट चेक करके जा चुका था। मैं उठी और केबिन की चिटकनी बंद कर दी। राहुल मुझे घूर रहा था। उसकी नजर मेरी टाइट टी-शर्ट में उभरी चूचियों पर थी, जो मेरी साँसों के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं। मेरी जींस मेरी गांड को और उभार रही थी। मैंने देखा, वो बार-बार मेरी गांड को ताड़ रहा था। मेरे बदन में सिहरन होने लगी।उसने धीरे से कहा, “अगर मुझे तुम्हारा पति बनने का मौका मिला होता, तो मैं कब का बन गया होता। मैं तो तुम्हें बहन कम, गर्लफ्रेंड ज्यादा मानता हूँ।” ये सुनकर मेरे बदन में जैसे आग लग गई। मैंने हँसते हुए कहा, “तो आज रात मुझे अपनी गर्लफ्रेंड ही समझ लो।” मैं मजाक में बोली थी, लेकिन मेरे दिल में गुदगुदी हो रही थी। वो हँसा, लेकिन उसकी आँखों में शरारत थी।
मैं उसके बर्थ पर जाकर बैठ गई। धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के करीब आने लगे। कब तक हमारी साँसें टकराने लगीं, पता ही नहीं चला। उसका हाथ मेरे गाल पर आया, मैंने आँखें बंद कर लीं। फिर अचानक उसके होंठ मेरे होंठों से जुड़ गए। ओह्ह… उसकी गर्म साँसें, उसके होंठों का नरमपन… मैं ऐसे लगी जैसे पिघल रही हूँ। हम दोनों एक-दूसरे के होंठ चूसने लगे। उसकी जीभ मेरे मुँह में आ गई, मैं उसकी जीभ को चूस रही थी। मेरी चूत पूरी तरह गीली हो चुकी थी। मुझे एहसास हुआ कि उसके जींस में उसका लंड सख्त होकर तन गया है।
“राहुल… ये क्या हो रहा है?” मैंने सिसकारी लेते हुए कहा। उसने मेरे कान में फुसफुसाया, “जो होना चाहिए, वही हो रहा है।” उसका हाथ मेरी टी-शर्ट के ऊपर से मेरी चूचियों पर गया। वो उन्हें सहलाने लगा। मेरी साँसें और तेज हो गईं। “उफ्फ… राहुल, धीरे…” मैंने कहा, लेकिन मेरे बदन में जोश की लहर दौड़ रही थी। उसने मेरी टी-शर्ट ऊपर उठाई और मेरी ब्रा में कैद चूचियों को देखकर पागल हो गया। “दिव्या, ये कितनी मस्त हैं…” उसने कहा और मेरी ब्रा का हुक खोलने की कोशिश करने लगा।मैंने हँसते हुए उसकी मदद की। जैसे ही ब्रा खुली, मेरी 34C की गोल-गोल चूचियाँ आजाद हो गईं। मेरे निप्पल सख्त हो चुके थे। राहुल ने दोनों चूचियों को अपने हाथों में लिया और जोर-जोर से मसलने लगा। “आह्ह… राहुल, धीरे कर… उफ्फ…” मैं सिसकारियाँ ले रही थी। उसने मेरे निप्पल को अपनी उँगलियों से रगड़ा, और मेरे पूरे बदन में करंट दौड़ गया। वो मेरी एक चूची को मुँह में लेने लगा। उसकी गर्म जीभ मेरे निप्पल को चाट रही थी, और मैं पागल हो रही थी। “ओह्ह… राहुल… और चूस… आह्ह…” मैं उसके बालों में उँगलियाँ फिरा रही थी।
थरथराते हाथों से मैंने उसकी जींस का बटन खोलने की कोशिश की। वो खुद ही नीचे के कपड़े उतारकर बिस्तर पर लेट गया। उसका लंड ऊपर की ओर खड़ा था - मोटा, लंबा, तना हुआ। मैंने हाथ आगे बढ़ाया, धीमे दबाव से उसे सहलाया। "ये तेरा है…" उसकी आवाज़ भारी थी। मैंने सिर झुकाया, मुँह में ले लिया। गर्मी महसूस हुई, छोटी लहर सी शरीर में दौड़ गई। जीभ घुमाई, धीमे-धीमे आगे बढ़ी। वो सांस रोके हुए था, बालों में उसकी उंगलियाँ फंसी थीं। एक झटके के साथ मैंने गहराई तक ले लिया। तभी मेरी चूत से नमी टपकने लगी।
उस वक्त मैंने कहा, "राहुल... और देर नहीं कर सकती," फिर धीरे से जींस और अंडरवियर नीचे उतार दिए। शरीर पर अब कुछ भी नहीं था। चोद़ गीली थी, गर्मी मच रही थी। बर्थ पर झुककर लेट गई, टाँगें खींचकर अलग कर दीं। राहुल कमरे में आया, पास आकर घुटने टेके। जीभ ने चोद़ के किनारे को छुआ, फिर सीधे मुखड़े पर दबाव डाला। “आह्ह… ऐसे ही… हाँ… ओह्ह…” मैंने अपने स्तन दबाए, सांसें तेज हो गईं। एक उंगली धीरे से अंदर घुसी, फिर बाहर, फिर अंदर। दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई। “अब… तुरंत… अंदर कर दे,” मैं बड़बड़ा उठी, आवाज में बेचैनी थी।
उसका लंड मेरी चूत के किनारे टिक गया। मैंने अपनी जांघें थोड़ी और खोल दीं। "थोड़ा धीमा, राहुल... हाय...", मेरे मुँह से निकला। फिर उसने आहिस्ता से अंदर घुसा दिया। "ऊँह..." मेरी सांस भाप बनकर निकली। उसकी मोटी छड़ मेरी तंग चूत में धीरे-धीरे डूब रही थी। "अरे बाप रे... कितनी संकरी है तू," उसने बोला और एक झटके में अंदर धंस गया। "ऊह... राहुल... ऐसे नहीं... हाय...", मैं बिलख उठी। वह तेज-तेज धक्के देने लगा। "जोर से चोदो मुझे, राहुल... और गहरे... हौंह... ऊँह..." मेरी चीखें बढ़ती गईं। ट्रेन के पटकते पहियों की आवाज़ मेरी तरछी सांसों में घुल गई।
“दिव्या, तेरी चूत कितनी गर्म है… उफ्फ…” वो मेरी चूचियाँ मसलते हुए पेल रहा था। मैं अपनी गांड उठा-उठाकर उसके लंड को और अंदर ले रही थी। “हाँ… और जोर से… चोद मुझे… आह्ह…” मैं पागल हो रही थी। उसने मुझे घोड़ी बनाया और पीछे से मेरी चूत में लंड डाल दिया। “उफ्फ… राहुल… तेरी गांड मारूँ क्या?” उसने हँसते हुए कहा। मैंने सिसकारी लेते हुए कहा, “पहले चूत को तो संभाल ले… आह्ह…” वो मेरी गांड पर थप्पड़ मारते हुए जोर-जोर से पेल रहा था। “आह्ह… उफ्फ… हाय… और जोर से…” मैं चिल्ला रही थीलगभग 45 मिनट तक वो मुझे अलग-अलग पोजीशन में चोदता रहा। मैं दो बार झड़ चुकी थी। आखिर में उसने अपना लंड निकाला और मेरे मुँह में डाल दिया। “चूस इसे, दिव्या…” उसने कहा। मैंने उसका लंड चूसा, और उसका गर्म माल मेरे मुँह में छूट गया। मैंने सारा माल पी लिया। “उफ्फ… राहुल… ये क्या था…” मैं हाँफते हुए बोली।रात भर हम दोनों एक-दूसरे के साथ खेलते रहे। कभी वो मेरी चूचियाँ चूसता, कभी मैं उसका लंड। सुबह जब दिल्ली पहुंचे, तो मेरी टाँगें काँप रही थीं। मेरी चूत और चूचियाँ सूज गई थीं, लेकिन दिल में एक अजीब सी तृप्ति थी। “राहुल, ये रात भूलने वाली नहीं…” मैंने कहा। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “अभी तो पूरी जिंदगी पड़ी है, दिव्या।”
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