पड़ोस में आई एक नई भाभी को खुब चोदा
एक नई किरायेदार आई मेरे पड़ोस में। वो ऐसी थी कि ध्यान खींच लिया। मुझसे मिलवाया उसे मकान मालिक ने। हालाँकि, शुरू में कुछ नहीं सोचा था। अब सबका हाल चलता है? उम्मीद है, पढ़ने में मजा आ रहा होगा। मैं भी इस तरह की कहानियाँ काफी समय से पढ़ता आया हूँ।.
यहां ढेर सारी कहानियां मैंने पढ़ ली हैं। अब बारी है एक ऐसी घटना के बारे में बताने की, जो मेरे साथ हुई - नई भाभी के साथ। उम्मीद करता हूँ, तुम्हें यह कहानी रखेगी ध्यान। मेरा नाम गौरव है। रहता हूँ अमृतसर में, पंजाब में। उम्र है चौबीस साल। पढ़ाई करता हूँ बी.ए पहले साल। घर में माता-पिता, छोटा भाई और मैं। तीन साल कम उम्र भाई की मेरे से। दिखने में कुछ खास नहीं। लंबाई मेरी 7 इंच की है।.
पाँच साल पीछे की बात है। मेरी उम्र उस वक्त उन्नीस साल थी। कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। अब तक किसी के साथ सेक्स नहीं हुआ था मेरा।.
उधर पड़ोस में एक मकान है। वहीं रहने वाले मालिक ने किराये पर देने का फैसला किया था। खुद तो शहर से बाहर रहते थे।.
घर के बाहर सामान लेकर आ रहा था मैं। तभी एक औरत को मकान दिखाने वाले आदमी ने मुझे पहचान लिया। उन्होंने चिल्लाकर मेरा ध्यान खींचा। पास जाने पर बताया – इन्हीं के साथ अब तुम्हारा पड़ोस शुरू होगा। नजर उठाकर देखा, तो ऐसी छाप छोड़ी जैसे कोई तस्वीर ज़िंदा हो गई हो।.
चिट्टी सफ़ेद पड़ोसन बहुत मज़बूत क़िस्म की थी। उम्र के हिसाब से तो वो लगभग 39 साल की होगी। आकृति कुछ इस अंदाज़ में थी - लगभग 34-30-34। अपने आप को देखने से नहीं रोक पाया।.
फिर वो मकान मालिक मेरी मुलाकात उससे करवा देता। उसने महिला का परिचय भी दिया। नाम सुना तो लगा - करिश्मा।.
घर के मालिक ने करिश्मा से कहा, कभी कुछ ज़रूरत पड़े तो गौरव से बात करना।.
करिश्मा मुझे देखकर हंसी। फिर बोली - चिंता मत करो, गौरव से ज़रूर कह दूंगी।.
मुस्काते हुए मैंने कहा - ज़रूरत पड़े तो बेझिझक संपर्क करना।.
बस इतना कहकर मेरी जुबान थम गई।.
कुछ दिन बाद मकान मालिक के साथ करिश्मा की बात होने लगी।.
फिर मैंने उनसे पूछा, और धीरे-धीरे घर की तरफ चल पड़ा।.
थोड़ी देर बाद घंटी की आवाज़ आई। दरवाज़ा खोलने मम्मी उठ गईं, तभी मैंने खिड़की से झाँका। बाहर वही अजीबो-गरीब लड़की खड़ी थी, जिसका नाम करिश्मा था। उन्हें देखकर मम्मी के चेहरे पर हैरानी छा गई। तब मैंने धीरे से कहा - ये नई आई हैं, पड़ोस में रहती हैं।.
मैंने इतना कहा, फिर पीछे मुड़कर कमरे के भीतर चला गया।.
अंदर से आवाज़ आई, फिर मम्मी ने करिश्मा को बुला लिया।.
अंदर जाते हुए करिश्मा ने मम्मी से कह दिया - गौरव से थोड़ी मदद चाहिए। पल भर में मम्मी की आवाज़ सुनाई दी।.
बाहर कदम रखते ही मैं सड़क पर था।.
माँ ने कहा - बेटा, करिश्मा को तुम्हारी ज़रूरत है। चलकर वहाँ झांक आओ।.
हवा में एक इशारा किया, करिश्मा की ओर। पलट कर चल दी वो, अपने रास्ते। पीछे-पीछे हो लिया मैं, कदम।.
एक बार मैं जब उसके घर पहुँचा, तो अचानक उसने हाथ में बल्ब थमा दिया। फिर बोला - दीवार पर लगे होल्डर में डाल दो, मेरी पहुँच नहीं हो रही।.
ठीक है, मैं संभाल लेता हूँ।
ऊपर कुर्सी पर चढ़कर मैंने बल्ब लगा दिया। थोड़ा सा सामान समेटने में करिश्मा के साथ मिलकर काम किया। बीच-बीच में, जब भी नजर गई, उसके तने हुए चूचे पर ठहर गई - आंखों में छुपी चुदाई की झलक थी। कभी-कभी वो मेरी नजर पकड़ लेती, ऐसे मौके पर भी चुप रहती। कोई तीस मिनट बाद, जब मैं जाने लगा, तो बोली - गौरव, रुको… चाय पी लो।.
थोड़ी देर के लिए मैं ठहर गया, जब करिश्मा ने बात की।.
थोड़ी देर में उसने चाय तैयार करके ला दी। चाय के साथ हम बातें करने लगे।.
एक समय पर उसने कहा कि रेलवे में ऊंची नौकरी पर काम करती है। घर की बात आई तो पता चला, चंडीगढ़ के आसपास के गाँव में रहती है। धीरे-धीरे बातचीत में खुला दिल, और पता चला कि पति को एक साल पहले खो चुकी है।.
उसके पति के निधन पर मैंने दुख व्यक्त किया।.
करिश्मा ने फिर सवाल किया, तुम्हारा काम क्या है?
कितनी देर बाद पता चला कि दो घंटे बीत चुके थे। मैंने खुद के बारे में उसे सुनाया, फिर बातें आगे बढ़ती गईं।.
घर पहुँच चुका था मैं।.
थोड़े महीने ऐसे ही बीत गए। धीरे-धीरे वो हमारे बीच अपनी जगह बना चुकी थी। कभी-कभी मैं करिश्मा के घर चला जाता था। दोनों एक साथ चाय पीते हुए लंबे वक्त तक बातें कर लेते थे।.
एक दिन रात के वक़्त 9 बजे के करीब मैं अपने घर के बाहर घूम रहा था, तब गली में कोई नहीं था. तो मैं घूमते-घूमते करिश्मा के घर पास आ गया. उसके रूम की खिड़की खुली थी. उस खिड़की के सामने शीशा था … और उसके साथ बेड था. मैंने उत्सुकतावश अन्दर झांक कर देखमैंने जो देखा, वो देखकर मैं हैरान रह गया. कमरे में करिश्मा बिलकुल नंगी शीशे के सामने खड़ी थी. वो अपने एक हाथ से अपने मम्मे को मसल रही थी और दूसरे हाथ से अपनी चूत को सहला रही थी. उसके मुँह से कुछ अजीब सी आवाजें निकल रही थीं. ये सब देखकर मेरा लंड खड़ा हो गया. मैं समझ गया कि नई भाभी की चुदाई की इच्छा हो रही हैतभी करिश्मा ने शीशे से ध्यान से देखा, तो उसे पता चल गया कि मैंने उसे नंगी देख लिया है. मेरी नजर भी शीशे के माध्यम से उसकी नजरों से मिल गईं और मैं घबराकर वहां से अपने घर आ गया.
उसके बाद जब मैं अगली सुबह कॉलेज जाने लगा, तभी नज़र पड़ी करिश्मा मेरी तरफ बढ़ती हुई।.
पल भर को पैर जमीन पर चिपक गए, फिर मुँह के अंदर सब कुछ सूखता महसूस हुआ।.
उसने पास आकर कहा - अब से खिड़की से देखता है तो मैं घर जाकर बता दूंगी। मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। कुछ बोले बिना ही मैं वहाँ से चला आया। करिश्मा से बातचीत करना मैंने उसी दिन बंद कर दिया। .
उसकी ओर नज़र उठाकर भी नहीं देखता था। डर लगता था, कहीं वो फिर से झड़प न दे।.
बीस दिन से कम का वक्त हुआ था इस घटना को।.
एक दिन मैं घर की छत पर बैठा हुआ था। फिर अचानक करिश्मा वहाँ पहुँच गई। उसने अपनी छत से लगातार कदम बढ़ाए, मेरी तरफ।.
उसने कहा - अब तो वो हमसे एक शब्द भी नहीं बोलते।.
चुप रहा। मुख पलट गया मेरा।.
फिर उसके मुंह से निकला - उस घटना को लेकर गुस्सा है तू।.
तब भी मैं चुप रहा।
उसने कहा, गौरव, उस दिन के लिए माफ़ करना… लेकिन तब तुमने मुझे बिलकुल नंगा देख लिया था, इसी वजह से मन में झटका-सा हुआ। तुम्हें प्यार करती हूँ… और मेरे साथ ऐसा न भूलो।.
उस पल मैंने करिश्मा को हां कर दिया।.
फिर वो बोली, सिर्फ़ ठीक... मैंने भी तुमसे प्यार करता हूँ कहा था। क्या इसका जवाब भी बस इतना ही होगा?
उस पल मैंने कुछ हकीकत खो दी। बेमन से करिश्मा की ओर मेरे होठ हिले। आवाज़ ने रास्ता भटक लिया। फिर वो शब्द आए… मैं तुमसे प्यार करता हूँ।.
उसके मुंह से निकला - गौरव, तुम्हारी पहली नज़र से ही मैं खींची चली आई। जैसे तुमने मेरी ओर देखा, वैसे ही कुछ डरते हुए, कुछ लुभाए हुए।.
उसकी ओर नजर डालते ही मैं मुस्कुरा पड़ा। उस दिन उसकी छातियों को देखना मेरे लिए बहुत अच्छा था… खासकर तब, जब करिश्मा ने मुझे ऐसा करते देखकर चुप रहना चुना। मैं मुस्कुराया, तो करिश्मा भी गहरे से मुस्कुराई। वह पास आई, फिर धीरे से अपने होंठ मेरे होंठों पर रख दिए। मैं ठिठक गया। पर एक इतनी खूबसूरत लड़की के होंठों से चुम्मा मिलना - ये मेरे लिए वरदान-सा लगा। अब मैंने भी उसके होंठों को चूम लिया।.
थोड़ी देर बाद, मम्मी की पुकार सुनकर हम एक-दूसरे से अलग हो गए। वह सीढ़ियों पर उतरते हुए बोली - आठ बजे के आसपास मेरे घर आ जाना… कुछ काम है तुमसे।.
उसने कहा ये कहकर घूमकर दरवाज़े की ओर बढ़ गई। मुझे एहसास हो गया था कि आज कुछ खास होने वाला है। ऐसी भाभी के साथ वक्त बिताना, जो करिश्मा जैसी लगती हो, मेरे लिए बड़ी बात थी।.
उस शाम करीब आठ बजे मैं वहाँ पहुँचा। दरवाज़े पर ध्वनि हुई, तो वो अंदर से आकर खोलने लगी। ऐसा लगा जैसे चारों ओर सन्नाटा छा गया... उसने एक लाल सलवार सूट पहन रखा था। ऊपर से दुपट्टा नहीं था। उसकी कुर्ती के गहरे खुले भाग से मेरी नज़र उसके भारी स्तनों पर ठहर गई।.
फिर करिश्मा ने मुझे धक्का देते हुए कहा - खड़े रहोगे यहीं, वरना अंदर जाने का इरादा भी है।.
अंदर के ओर कदम रख दिया।
वो बोली, तुम कमरे में चलो। मैं अंदर गया, फिर वो द्वार लगाकर मेरे साथ खड़ी हो गई।.
अंदर कदम रखते ही करिश्मा ने मुझे चूम लिया। मानो एक भूखी बाघिन सीधे मेरे ऊपर झपट पड़ी हो।.
लगभग पंद्रह मिनट चुम्मे करने के बाद, वो मेरे सभी कपड़े हटा गया। उधर, मैंने भी उसके कपड़ों को निकालना शुरू कर दिया।.
उसकी कुर्ती मेरे हाथों में आई, फिर वो नीचे सरक गई। काली ब्रा दिखी, उसके अंदर से छाती का एक किनारा झाँक रहा था। करिश्मा भाभी के सांस थमे, मैंने धीमे से उन्हें मुँह में ले लिया।.
उसके होठों से आहें निकलने लगीं। मैंने एक बार उसका दाहिना स्तन चूसा, फिर बायां ले लिया। वो ऐसे तड़प रही थी, जैसे बिजली का झटका लग गया हो। उसके मुँह से तेज-तेज घुघुराहटें निकलने लगीं। करिश्मा भाभी ने अचानक मेरे लिंग को मजबूती से पकड़ लिया। हम दोनों के बीच उम्र का ख्याल गायब हो चुका था। उसने कहा - अपनी सलवार उतार दे। मैंने तुरंत उसकी सलवार नीचे खींच दी। अब वो काली अंडरवियर में और भी खतरनाक लग रही थी। उसने धीमे से इशारा किया। मैंने पल भर में उसकी पैंटी भी उतार डाली। .
बस, कितनी साफ चूत थी… कहीं कोई बाल तक नजर नहीं आ रहा था। उसकी चूत फूली हुई थी, मेरे लिंग को खींच रही थी। मैंने उसे पास के सोफे पर लिटा दिया, टांगें अपने कंधे पर डाल लीं, और चूत चाटना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे मैं नीचे झुकता, उसके मुँह से आवाजें ऊपर उठने लगीं। पाँच मिनट न बीते थे कि करिश्मा भाभी ने पानी छोड़ दिया। मैंने हर बूंद चाट ली। फिर उठकर मैंने अपना लिंग उसके मुँह में रख दिया। वो मासूम बच्चे की तरह चूस रही थी। इसी बीच, मुझे ऐसा लगने लगा जैसे कहीं ऊपर जा रहा हूँ। .
थोड़ी देर तक लंड चुसाने के बाद मैंने करिश्मा भाभी को सोफे पर लिटा दिया। अब मैं उनकी चुत पर अपना लंड रगड़ने लगा। उन्होंने जांघें अलग कीं, धीमे से मेरा लंड अपनी चूत में लेना शुरू किया। मेरे लंड को थोड़ा दर्द हुआ… पहली बार ऐसा हो रहा था।.
मुँह से आह निकल ही गई। हो सकता है, पति के जाने के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था - किसी और का लंड उसकी चुत में।.
उसने कहा, धीमे-धीमे हिलो। करिश्मा भाभी ने मेरा लंड अपनी चुत में डाल लिया। फिर आगे पीछे होने लगी।.
जब मैंने धक्के देना शुरू किया, तो उसके मुँह से आवाज़ आने लगी - "अह… और गहरे में।" लंड को पूरा अंदर तक ले जाने लगा था मैं। चुत में चिकनाई थी, इसलिए घसीट-घसीटकर चल रहा था सब कुछ। कुछ वक्त बाद झटके देते हुए मैं शॉट भरने लगा था।.
आवाज़ें अब उसके मुँह से और तेज़ हो गई थीं - "अह… ऊ ऊ, फ़क मी।" वो धुंधली-सी आवाज़ें मेरे भीतर एक नई लपट जगा रही थीं। कुछ पल ऐसे ही चलते रहे, फिर मैंने लंड बाहर निकाला, और उसे कहा कि कुत्ते की तरह झुक जाओ।.
तुरंत वो डॉगी स्टाइल में पहुँच गया।
पीछे से अचानक लंड उसकी चूत में घुस गया।.
एकदम से लंड अंदर जाते ही उसके मुँह से 'अह... फ़क..' निकल पड़ा। पूरा डंडा खाते ही करिश्मा भाभी ने जोर-जोर से चोदने को कहा। मैंने धीरे-धीरे गति बढ़ाई, वो भी हर धक्के पर अपनी तरफ से झटके लगाने लगी। लगभग आधे घंटे तक मैंने उसकी नई औरत की कई मुद्राओं में जमकर चुदाई की। तेजी से चोदने के बाद हम दोनों साथ-साथ उतार दिए। थोड़ी देर बाद वो मेरे साथ चुंबन करने लगी। उसे मेरे साथ बहुत ख़ुशी महसूस हो रही थी। उसने कहा - गौरव, अब जीने का एक सहारा मिल गया है। कृपया यह बात किसी और के सामने न लाना। मैंने वादा किया कि किसी को कुछ नहीं बताऊँगा। .
उसके घर पहुँची, तब तक वो नींद में डूब चुकी थीं, इधर भैया की पत्नी पढ़ाई के लिए रवाना हो गई थी।
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