भैया के साथ छेड़छाड़

Jan 20, 2026 - 11:32
Feb 5, 2026 - 17:13
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भैया के साथ छेड़छाड़

दोस्तों, आज मैं एक कहानी सुनाा, जिसने मेरे और मेखला ी के रिश्ते को बदल िया। े कहानी है प्यार ी, हवस ी, और एक ऐसी आग की, जो हम दोों के बीच धधक उठी। मेखला मुझसे तीन साल ी बड़ी है। उनकी शादी तब हुई थी, जब मैं कॉलेज ें दूसरे साल में पढ रहा था। शादी के बाद वो ुंबई चल गईं, अपने पति के साथ, क्योंकि उनका का वहीं था। दो साल बाद, जब उनकी शादी को इतना समय   ा, मैं ी इंजीनियरिंग खत कर चुका था। करी की तलाश में ैं  रहा था।

एक-एक कंपनी ो रिज्यूमे भेजत रहा, ि इंटरव्यू के लिए ौड़ रहा। पर एक ि मुंबई की फर से ुलाा आया। चल दिया मुंबई, बातच , और कहाँ  कहाँ पहुँ गया – करी मिल गई। सोमवार   ्यू पर  लग गया। खुशी का ि नहीं रहा, तो मेखला दीदी को फोन िया। उनक हर पर भी वही खुशी ा गई।

मेखला दीदी ने फोन पर कहा, “रोहन, अगर तुझे मुंबई में ही जॉब मिली है, तो हमारे साथ ही रह ले। वैसे भी यहाँ सिर्फ़ मैं और तेरे जीजू हैं। तेरा ऑफिस भी यहाँ से नज़दीक है, तो कोई दिक्कत नहीं होगी।”

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मैंने जवाब दिया, “नहीं दीदी, मैं आपको और जीजू को परेशान नहीं करना चाहता। मैं कोई फ्लैट ढूंढ लूंगा। इंटरनेट पर देखा है, कुछ ऑप्शन्स मिल भी गए हैं।”

दीदी ने हंसते हुए कहा, “पगले, हमारे पास दो रूम का फ्लैट है। एक रूम में मैं और तेरे जीजू रहते हैं, दूसरा रूम लगभग खाली पड़ा है। तू वो रूम ले ले। न मुझे, न तेरे जीजू को कोई परेशानी होगी।”

मा  पर मैं उनके साथ रहने को ार हो गया। ़े दिनों के लिए अपने शहर कर सामान  किा। घर पर मम्मी-पापा ने नए ाम के लिए  आशी दी। लंच के बाद रवि ो सामान लेकर मुंबई की ओर चल िा। शाम को पहुँचकर टैक्सी ली, सीधा दीदी के घर ा पहुँचा। उस दिन ी थी, इसलि जीजू भी घर पर िे। दोनों ने मिलकर बह ार िाया। ि े-े बातें आग बढे लगीं।

थोड़ी देर ें कुछ  घर पहुँ गए। मैंने बड़ी बहन से पूछ िया - इनका ना ा है। उन्होंने कह िया, ये जीजा के  ैं,  में उनके परि ाले ी हैं। मैंने सबको नमस् कहा, िर अपन कमरे में ौट आया, ीवी चला दिा। ि्म चल रह ी,  ही नहीं रह ि घंटा बी गया। अचानक  दर आईं, बोलीं - “रोहन, बाहर झट े चले जा, मैं  बदलने ी हूँ।”

मैंने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ, दीदी? जो कपड़े आपने पहने हैं, वो तो ठीक हैं न?”

दीदी ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा, “प्लीज़ बाहर जा, रोहन। मुझे कपड़े चेंज नहीं करने, बस ब्रा निकालनी है। मेरी ब्रा का हुक पीछे से टूट गया है, तो मुझे ब्लाउज़ के अंदर से ब्रा उतारनी है।”

गर्मी में भी पसीना  गया, जब उन्होंने ऐसा कह दिा। तब खड़ा रह गया मैं। भलकर ा - “ी, पस कमरे में चल , या ि बाथरूम में। मुझे बाहर क्यों धकेल रही हो?”

दीदी ने जवाब दिया, “तेरे जीजू बाथरूम में नहाने गए हैं। मेरे बेडरूम में मामा जी सो रहे हैं, और ड्रॉइंग रूम में मामी जी और उनके बच्चे हैं। अब तू बहस मत कर, प्लीज़ थोड़ी देर के लिए बाहर जा।”

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मैं ीरे से कमर े बाहर  गया, ि बच्चों के साथ खेलने लगा। दीदी के शब िर ें मत रहे, बार-ार। अचनक मन में उनकी ब्रा और ी की छवि ैर गई। परेशान हो गया, क्योंकि इस तरह के ख्याल पहल कभी नहीं आए थे। हााँकि, दीदी ने भी मुझसे ऐसा पहले कभी नहीं कहा था।

ख्यालों में  ा था तभ दरव़े की आव आई। दीदी किचन की तरफ जा रही थीं। चलते-चलत एक झलक उनक पकड़ में आई, ऐसी नज़र से देखा   गलत  रह ो। ब्लाउज़ पर पट्टिों के निशान नहीं थे, समझ गया ब्रा उतार दी ै। तभी लंड में हलचल ,  े बी िकु़न  गई पलटकर कमरे में ा, दरवाज़ा  धम े बंद  िर नज़र गई बेड पर, वहाँ पड़ी ी 34B साइज़ की  ब्रा। दिमा़ में आग लग गई। हाथ में उठाया, और सव उठा - अगर े इतनी तगड़ी लग रही है, तो असल ़ें कितनी बसरत होंगी?

 में ब्रा कर ैं उसक  को े- ूँघना शुरू किया। दीदी के इत के  वच  आत ी खुशबू ने दिमा पर ऐस असर  ि सब   गया। आँखें बंद करके उनें ाद करने लगा, एक हाथ से कपड़े को , दूसरे से शर पर झटक िए। तभी गाल पर चढ़ी ेज़ थप्पड़ ने  ें ा। खुली ों े देखा - दीदी सामने खड़ी थीं। इतना ा था कि ़ा ी नहीं ा कि वो कब कमरे में  आईं। दरवाज़ा बस बंद किया था, ाला लग मन  िकल गया था।

थप्पड़   होश आया। सिर  करके खड़ा हो गया ैं। दीदी  रहीं, मगर ्रा हाथ से छीन ी। ि बोलीं - “खाना तै है।” घबरहट ें गकर खाने पर  गया। सभ े साथ जमकर खाया, िर कमरे में टकर बैठ गया। डर लग रहा था, यद दीदी ने जीजू को  कह दिया ो। अगर ऐस , तो िर  नहीं बचा। इन्हीं ों में उलझ रहा… कब ीं   िा, एहसास ही नहीं 

अगली सुबह जब  ी, मेहमान यब थे। जीजू नाश्ते में यस े। दीदी-जीजू  बचने के लिए ैं सीधे बाथरूम में घुस गया, ि रहा आधे घंटे तक ि अचानक दरवाज़े पर  ठक-ठक , आव आई - “रोहन, दर ही रहेगा या बाहर भी िकला?” झट से बाहर आया, तैयार हुआ, और डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। जीजू तब तक ऑफिस चल गए थे। दीदी रस से नाश्ता लाईं, प्लेट लेकर मेरे सामने बैठ गईं। एकदम  ें उनकी नज़र मे ऊपर ठहर गई,   गई, बोलीं - “रोहन,   कर ा।”

मैंने कहा, “दीदी, सॉरी तो मुझे बोलना चाहिए। मेरी ऐसी हरकत के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। अब ऐसा दोबारा नहीं होगा।”

दीदी ने कहा, “हाँ, ठीक है, लेकिन मुझे बुरा लग रहा है कि मैंने तुझे थप्पड़ मारा।”

मैंने जवाब दिया, “इट्स ओके, दीदी। थैंक यू।”

दीदी ने फिर कहा, “रोहन, क्या मैं तुझसे एक बात पूछ सकती हूँ, अगर तुझे बुरा न लगे?”

मैंने कहा, “हाँ, दीदी, पूछो।”

दीदी ने पूछा, “तेरी कोई गर्लफ्रेंड है?”

मैंने जवाब दिया, “कॉलेज में थी, अब नहीं है।”

दीदी ने फिर पूछा, “तो क्या तू उसकी ब्रा के साथ भी ऐसा करता था?”

इस सवाल ो सुनकर मैं तब रह गया। मन में सोचा, अब दीदी को क्या कहूँ। ़ी देर बा ोला, "नहीं, दीी।" उधर े हं  गई ि ीं, "अरे, क्यों? क्या वो मेरी तरह चटख ब्रा नहीं पहनती थी?" और  िया, "ा उसके स्तन मेरे जैसे शना नहीं थे?"

एकदम सन रह गया मैं,   ें जम ा हूँ। थोड़ी   होश ा,  े बोल पड़ा - “आप ऐसा क्यों कह रही हैं, ? कुछ समझ नहीं आ रहा।”

दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, पगले। तो मैं तुझे समझाती हूँ।”

ये कहते ही दीदी अपनी डाइनिंग चेयर से उठीं और मेरे पास आ गईं। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही उन्होंने अपने गर्म, रसीले होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और मेरी जांघों पर बैठ गईं। उनकी इस हरकत ने मेरे होश उड़ा दिए। मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके रसीले होंठों को चूसने लगा। किस करते-करते दीदी ने मेरा बायाँ हाथ उठाया और अपने बूब्स पर रख दिया। मैं तो एकदम उत्तेजित हो गया। धीरे-धीरे मैंने उनके गोल-मटोल बूब्स को सहलाना शुरू किया। उनके ब्लाउज़ के ऊपर से उनके निप्पल्स की सख्ती महसूस हो रही थी। कुछ देर बाद दीदी ने मेरे होंठों से अपने होंठ हटाए और बोलीं, “रोहन, तू अपनी बहन को टेबल पर ही चोदेगा या बेडरूम में ले जाएगा?”

मैंने शरमाते हुए कहा, “बेडरूम में अच्छा रहेगा, दीदी। वहाँ ज़्यादा मज़ा आएगा।”

हम दोनों बेडरूम की ओर चल पड़े। कमरे में घुसते ही मैं दीदी के ऊपर लेट गया और वो मेरे नीचे। मैंने फिर से उनके रसीले होंठों को चूमना शुरू किया। उनके गालों पर, गर्दन पर, मैं चूमता हुआ नीचे की ओर बढ़ने लगा। दीदी के ब्लाउज़ के बटन खोलते हुए मैं उनकी क्लीवेज तक पहुँचा। हर बटन खुलने के साथ मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। ब्लाउज़ उतारते ही दीदी पर्पल ब्रा में थीं। उनकी ब्रा में कैद बूब्स इतने मस्त लग रहे थे कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैंने उनकी ब्रा भी उतार दी। उनके गोल, मुलायम बूब्स मेरे सामने थे, जिनके गुलाबी निप्पल्स सख्त हो चुके थे। मैं एक भूखे बच्चे की तरह उनके बूब्स पर टूट पड़ा। उनके निप्पल्स को चूसने लगा, जीभ से सहलाने लगा और हल्के-हल्के दाँतों से काटने लगा।

दीदी बह उत्तेि हो गई ीं, ऐस लग रहा था ैसे यम   ों। कमरे में उनक आवाज़ें भर पड़ी थीं - “आआहह… रो… उउउफफ… स्स्स्स… ़ा और…” मैंने ीरे से उनक तन दबा, ि चूसन  िा, निपल्स पर जीभ ा दी। सांें तेज़ हो गई ीं उनकी, आव ें पकी - "हहह… ईईई… रोहन… तू तो  अलग ही ै…”

अब मैंने  े उनकी साड़ी े खीं दी। पेटीकोट सरककर फर पर  गया। दीदी  ास अब सिर्फ एक ैंगन  ी पैंटी थी, जो नम हो चुकी थी। मैंने पैंटी भी उतार ली। उनकी चूत सा और ी थी, मखन की तरह चमक रही थी। मैंने अपने कपड़े जल्दी  ें िए। मेरा लंड ा खड़ा था,  8  ा। उनक नज पड़ी, ो मुा उठीं। बोलीं, “ओह, रोहन! तेरा तो तेरे जीजा से भी बड़ा है। आज  अलग  ा।”

उसने मेरा हाथ पकड़ा, े से ींा। मुँह में िा, गरहट  गई। ऐसे लगा जैसे कोई ि चख रही हो। नरम जीभ ऊपर  ो रही थी, सिर चकर गया। ि बोी, "अब तेरी ारी, ोहन,"

मैंने कहा, “दीदी, मैंने कभी चूत नहीं चूसी।”

दीदी ने हंसते हुए कहा, “एक बार चूस ले, फिर तू हर रोज़ मेरी चूत चूसेगा।”

ों  अलग िा मैंने, फि   उसकी चुतड़ के किारे ़े। वहाँ नमी थी, बदनाम कर ेने  शब ी। जीभ आग बढ़ी, चटख ेते  चाटने लगी। क्लिट पर दब बढ़ा, चूसने लगा। ऊपर से आव़ें आईं - “आआहह… उउउ… स्स्स्स…”   ों   ेरा िकला - “ोहन… और… ईईई… हहह…” तरल मेरे होंों तक पहुँ रहा था। ़ी  ा मैंने क्लिट को, जिससे उनक आवाज़ें ी हो गईं - “उउउफफ… रोहन… तू तो मेरी जान ले लेगा…!”

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कुछ देर बाद मैंने कहा, “दीदी, अब नहीं रहा जाता। मैं अंदर डालूँगा।”

दीदी हंस पड़ीं और बोलीं, “ठीक है, मेरे राजा। आ जा, अपनी बहन को चोद दे।”

ऊपर चढ ी मैं उनके  पहुँ गया। दीदी   ने मेरे लिं को पकड़ा, ि  की जघन की ओर  गए ीमेपन  ैंने अंदर सना शुरू किया। तं  ें लिं जाते ही ऐस लगा, मा सब कु ा दिया  ां  उनकी - “आआहह… उउउफफ… रोहन… धीरे… तेरा लंड बहुत बड़ा है…!” धक लग गए, धीरे-धीरे। हर झटक पर  और तेज ां  लगीं, “हहह… स्स्स्स… ईईई… और ज़ोर से…!”

मैंने ी से धके दे  कर िा। मेरा लंड उनकी चूत में आगे-े हो रहा था। कमरे में हर झटके की आवाज  रही थी, “थप… थप… थप…” दीदी की चूत का ी मेरे लंड पर लग बह रहा था। वो मेे सी े चिपकी रहीं, कभी अपने ों से मे कमर   लेती थीं। मैं उनके बूब्स को चूसता हु, लगातार दर धक रहा था। उनकी सांें अब चीखों में बदल गई थीं, “आआआ… उउउ… रोहन… ज़ोर से ो… और… ईईई…!”

कभी वो नीचे ीं, कभी ऊपर  गईं। मेरा लंड उनकी चू ें  रहा था। मैंने उनके निप्पल पर फिर ुँ लगा, तब दीदी और भड उठीं। उनके हों ुले, “रोहन… तू तो मेरी चूत फाड़ देगा… आआह… ज़ोर से…!”

़ी देर े बाद उनोंने कहा, "रोहन, अपना ामा बाहर निका तर नहीं।" मैंने ुना, ि आखिरी धक्के के साथ अपना लंड ीं लिा, जब   रह ीं। उस पल उनका पेट मे ींों से भर गया।  ां फू रही थीं, मगर आँखों में एक तरह ी चमक थी। बोली, "तू तो बह अचा चोदता है।"

उस दिन के बाद सब  अलग  गया। पहले मेरे पास करी अच्छी थी, ि घर में  सब कु भल गया। जीजू तर हर रहते, ऐसे में मौके आपन आप मिल जाते। अब तो   समझ नहीं आता कि मेखला दीदी मेरी बहन हैं या ि कहीं जीजू की पत लगन लग ैं।

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