भैया के साथ छेड़छाड़
दोस्तों, आज मैं एक कहानी सुनाऊँगा, जिसने मेरे और मेखला दीदी के रिश्ते को बदल दिया। ये कहानी है प्यार की, हवस की, और एक ऐसी आग की, जो हम दोनों के बीच धधक उठी। मेखला मुझसे तीन साल की बड़ी है। उनकी शादी तब हुई थी, जब मैं कॉलेज में दूसरे साल में पढ़ रहा था। शादी के बाद वो मुंबई चली गईं, अपने पति के साथ, क्योंकि उनका काम वहीं था। दो साल बाद, जब उनकी शादी को इतना समय हो चुका था, मैं भी इंजीनियरिंग खत्म कर चुका था। नौकरी की तलाश में मैं घूम रहा था।
एक-एक कंपनी को रिज्यूमे भेजता रहा, फिर इंटरव्यू के लिए दौड़ता रहा। पर एक दिन मुंबई की फर्म से बुलावा आया। चल दिया मुंबई, बातचीत हुई, और कहाँ से कहाँ पहुँच गया – नौकरी मिल गई। सोमवार को ही ड्यूटी पर भी लग गया। खुशी का ठिकाना नहीं रहा, तो मेखला दीदी को फोन किया। उनके चेहरे पर भी वही खुशी छा गई।
मेखला दीदी ने फोन पर कहा, “रोहन, अगर तुझे मुंबई में ही जॉब मिली है, तो हमारे साथ ही रह ले। वैसे भी यहाँ सिर्फ़ मैं और तेरे जीजू हैं। तेरा ऑफिस भी यहाँ से नज़दीक है, तो कोई दिक्कत नहीं होगी।”
मैंने जवाब दिया, “नहीं दीदी, मैं आपको और जीजू को परेशान नहीं करना चाहता। मैं कोई फ्लैट ढूंढ लूंगा। इंटरनेट पर देखा है, कुछ ऑप्शन्स मिल भी गए हैं।”
दीदी ने हंसते हुए कहा, “पगले, हमारे पास दो रूम का फ्लैट है। एक रूम में मैं और तेरे जीजू रहते हैं, दूसरा रूम लगभग खाली पड़ा है। तू वो रूम ले ले। न मुझे, न तेरे जीजू को कोई परेशानी होगी।”
मान लेने पर मैं उनके साथ रहने को तैयार हो गया। थोड़े दिनों के लिए अपने शहर जाकर सामान तैयार किया। घर पर मम्मी-पापा ने नए काम के लिए खूब आशीष दी। लंच के बाद रविवार को सामान लेकर मुंबई की ओर चल दिया। शाम को पहुँचकर टैक्सी ली, सीधा दीदी के घर जा पहुँचा। उस दिन छुट्टी थी, इसलिए जीजू भी घर पर मिले। दोनों ने मिलकर बहुत प्यार दिखाया। फिर धीमे-धीमे बातें आगे बढ़ने लगीं।
थोड़ी देर में कुछ लोग घर पहुँच गए। मैंने बड़ी बहन से पूछ लिया - इनका नाम क्या है। उन्होंने कह दिया, ये जीजा के चाचा हैं, साथ में उनके परिवार वाले भी हैं। मैंने सबको नमस्कार कहा, फिर अपने कमरे में लौट आया, टीवी चला दिया। फिल्म चल रही थी, ध्यान ही नहीं रहा कि घंटा बीत गया। अचानक दीदी अंदर आईं, बोलीं - “रोहन, बाहर झट से चले जाओ, मैं ड्रेस बदलने वाली हूँ।”
मैंने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ, दीदी? जो कपड़े आपने पहने हैं, वो तो ठीक हैं न?”
दीदी ने थोड़ा झुंझलाते हुए कहा, “प्लीज़ बाहर जा, रोहन। मुझे कपड़े चेंज नहीं करने, बस ब्रा निकालनी है। मेरी ब्रा का हुक पीछे से टूट गया है, तो मुझे ब्लाउज़ के अंदर से ब्रा उतारनी है।”
गर्मी में भी पसीना आ गया, जब उन्होंने ऐसा कह दिया। स्तब्ध खड़ा रह गया मैं। संभलकर बोला - “दीदी, वापस कमरे में चली जाओ, या फिर बाथरूम में। मुझे बाहर क्यों धकेल रही हो?”
दीदी ने जवाब दिया, “तेरे जीजू बाथरूम में नहाने गए हैं। मेरे बेडरूम में मामा जी सो रहे हैं, और ड्रॉइंग रूम में मामी जी और उनके बच्चे हैं। अब तू बहस मत कर, प्लीज़ थोड़ी देर के लिए बाहर जा।”
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मैं धीरे से कमरे से बाहर आ गया, फिर बच्चों के साथ खेलने लगा। दीदी के शब्द सिर में घूमते रहे, बार-बार। अचानक मन में उनकी ब्रा और छाती की छवि तैर गई। परेशान हो गया, क्योंकि इस तरह के ख्याल पहले कभी नहीं आए थे। हालाँकि, दीदी ने भी मुझसे ऐसा पहले कभी नहीं कहा था।
ख्यालों में डूबा बैठा था तभी दरवाज़े की आवाज़ आई। दीदी किचन की तरफ जा रही थीं। चलते-चलते एक झलक उनकी पकड़ में आई, ऐसी नज़र से देखा जैसे कुछ गलत हो रहा हो। ब्लाउज़ पर पट्टियों के निशान नहीं थे, समझ गया ब्रा उतार दी है। तभी लंड में हलचल हुई, छाती के बीच सिकुड़न दौड़ गई। पलटकर कमरे में घुसा, दरवाज़ा पीछे धम से बंद हुआ। फिर नज़र गई बेड पर, वहाँ पड़ी थी 34B साइज़ की क्रीम ब्रा। दिमाग़ में आग लग गई। हाथ में उठाया, और सवाल उठा - अगर ये इतनी तगड़ी लग रही है, तो असली चीज़ें कितनी खूबसूरत होंगी?
हाथ में ब्रा लेकर मैंने उसकी गंध को धीरे-धीरे सूँघना शुरू किया। दीदी के इत्र के साथ त्वचा से आती मीठी खुशबू ने दिमाग पर ऐसा असर डाला कि सब कुछ भूल गया। आँखें बंद करके उन्हें याद करने लगा, एक हाथ से कपड़े को छुआ, दूसरे से शरीर पर झटके दिए। तभी गाल पर चढ़ी तेज़ थप्पड़ ने होश में लाया। खुली आँखों से देखा - दीदी सामने खड़ी थीं। इतना घुला था कि अंदाज़ा भी नहीं था कि वो कब कमरे में घुस आईं। दरवाज़ा बस बंद किया था, ताला लगाना मन से निकल गया था।
थप्पड़ के बाद होश आया। सिर नीचे करके खड़ा हो गया मैं। दीदी चुप रहीं, मगर ब्रा हाथ से छीन ली। फिर बोलीं - “खाना तैयार है।” घबराहट में भागकर खाने पर बैठ गया। सभी के साथ जमकर खाया, फिर कमरे में लौटकर बैठ गया। डर लग रहा था, शायद दीदी ने जीजू को कुछ कह दिया हो। अगर ऐसा हुआ, तो फिर कुछ नहीं बचेगा। इन्हीं बातों में उलझा रहा… कब नींद ने घेर लिया, एहसास ही नहीं हुआ।
अगली सुबह जब आँख खुली, मेहमान गायब थे। जीजू नाश्ते में व्यस्त थे। दीदी-जीजू से बचने के लिए मैं सीधे बाथरूम में घुस गया, छिपा रहा आधे घंटे तक। फिर अचानक दरवाज़े पर धीमी ठक-ठक हुई, आवाज़ आई - “रोहन, अंदर ही रहेगा या बाहर भी निकलेगा?” झट से बाहर आया, तैयार हुआ, और डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। जीजू तब तक ऑफिस चले गए थे। दीदी रसोई से नाश्ता लाईं, प्लेट लेकर मेरे सामने बैठ गईं। एकदम बीच में उनकी नज़र मेरे ऊपर ठहर गई, मुस्कान आ गई, बोलीं - “रोहन, मुझे माफ़ कर देना।”
मैंने कहा, “दीदी, सॉरी तो मुझे बोलना चाहिए। मेरी ऐसी हरकत के लिए मैं शर्मिंदा हूँ। अब ऐसा दोबारा नहीं होगा।”
दीदी ने कहा, “हाँ, ठीक है, लेकिन मुझे बुरा लग रहा है कि मैंने तुझे थप्पड़ मारा।”
मैंने जवाब दिया, “इट्स ओके, दीदी। थैंक यू।”
दीदी ने फिर कहा, “रोहन, क्या मैं तुझसे एक बात पूछ सकती हूँ, अगर तुझे बुरा न लगे?”
मैंने कहा, “हाँ, दीदी, पूछो।”
दीदी ने पूछा, “तेरी कोई गर्लफ्रेंड है?”
मैंने जवाब दिया, “कॉलेज में थी, अब नहीं है।”
दीदी ने फिर पूछा, “तो क्या तू उसकी ब्रा के साथ भी ऐसा करता था?”
इस सवाल को सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मन में सोचा, अब दीदी को क्या कहूँ। थोड़ी देर बाद बोला, "नहीं, दीी।" उधर से हंसी छूट गई। फिर बोलीं, "अरे, क्यों? क्या वो मेरी तरह चटख ब्रा नहीं पहनती थी?" और जोड़ दिया, "क्या उसके स्तन मेरे जैसे खुशनुमा नहीं थे?"
एकदम सन्न रह गया मैं, मानो ठंढ में जम चुका हूँ। थोड़ी देर बाद होश लौटा, धीरे से बोल पड़ा - “आप ऐसा क्यों कह रही हैं, भाई? कुछ समझ नहीं आ रहा।”
दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, पगले। तो मैं तुझे समझाती हूँ।”
ये कहते ही दीदी अपनी डाइनिंग चेयर से उठीं और मेरे पास आ गईं। मैं कुछ समझ पाता, इससे पहले ही उन्होंने अपने गर्म, रसीले होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और मेरी जांघों पर बैठ गईं। उनकी इस हरकत ने मेरे होश उड़ा दिए। मैं खुद को रोक नहीं पाया और उनके रसीले होंठों को चूसने लगा। किस करते-करते दीदी ने मेरा बायाँ हाथ उठाया और अपने बूब्स पर रख दिया। मैं तो एकदम उत्तेजित हो गया। धीरे-धीरे मैंने उनके गोल-मटोल बूब्स को सहलाना शुरू किया। उनके ब्लाउज़ के ऊपर से उनके निप्पल्स की सख्ती महसूस हो रही थी। कुछ देर बाद दीदी ने मेरे होंठों से अपने होंठ हटाए और बोलीं, “रोहन, तू अपनी बहन को टेबल पर ही चोदेगा या बेडरूम में ले जाएगा?”
मैंने शरमाते हुए कहा, “बेडरूम में अच्छा रहेगा, दीदी। वहाँ ज़्यादा मज़ा आएगा।”
हम दोनों बेडरूम की ओर चल पड़े। कमरे में घुसते ही मैं दीदी के ऊपर लेट गया और वो मेरे नीचे। मैंने फिर से उनके रसीले होंठों को चूमना शुरू किया। उनके गालों पर, गर्दन पर, मैं चूमता हुआ नीचे की ओर बढ़ने लगा। दीदी के ब्लाउज़ के बटन खोलते हुए मैं उनकी क्लीवेज तक पहुँचा। हर बटन खुलने के साथ मेरी उत्तेजना बढ़ती जा रही थी। ब्लाउज़ उतारते ही दीदी पर्पल ब्रा में थीं। उनकी ब्रा में कैद बूब्स इतने मस्त लग रहे थे कि मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैंने उनकी ब्रा भी उतार दी। उनके गोल, मुलायम बूब्स मेरे सामने थे, जिनके गुलाबी निप्पल्स सख्त हो चुके थे। मैं एक भूखे बच्चे की तरह उनके बूब्स पर टूट पड़ा। उनके निप्पल्स को चूसने लगा, जीभ से सहलाने लगा और हल्के-हल्के दाँतों से काटने लगा।
दीदी बहुत उत्तेजित हो गई थीं, ऐसा लग रहा था जैसे संयम खो चुकी हों। कमरे में उनकी आवाज़ें भरी पड़ी थीं - “आआहह… रोह… उउउफफ… स्स्स्स… थोड़ा और…” मैंने धीरे से उनके स्तन दबाए, फिर चूसना शुरू किया, निपल्स पर जीभ घुमा दी। सांसें तेज़ हो गई थीं उनकी, आवाज़ में कंपकंपी - "हहह… ईईई… रोहन… तू तो कुछ अलग ही है…”
अब मैंने धीरे से उनकी साड़ी नीचे खींच दी। पेटीकोट सरककर फर्श पर आ गया। दीदी के पास अब सिर्फ एक बैंगनी रंग की पैंटी थी, जो नम हो चुकी थी। मैंने पैंटी भी उतार ली। उनकी चूत साफ और गुलाबी थी, मखन की तरह चमक रही थी। मैंने अपने कपड़े जल्दी से फेंक दिए। मेरा लंड पूरा खड़ा था, ठीक 8 इंच का। उनकी नज़र पड़ी, तो मुस्कुरा उठीं। बोलीं, “ओह, रोहन! तेरा तो तेरे जीजा से भी बड़ा है। आज कुछ अलग ही होगा।”
उसने मेरा हाथ पकड़ा, धीरे से खींचा। मुँह में लिया, गर्माहट फैल गई। ऐसे लगा जैसे कोई मिठाई चख रही हो। नरम जीभ ऊपर नीचे हो रही थी, सिर चकरा गया। फिर बोली, "अब तेरी बारी, रोहन,"
मैंने कहा, “दीदी, मैंने कभी चूत नहीं चूसी।”
दीदी ने हंसते हुए कहा, “एक बार चूस ले, फिर तू हर रोज़ मेरी चूत चूसेगा।”
पैरों को अलग किया मैंने, फिर धीमे से उसकी चुतड़ के किनारे छेड़े। वहाँ नमी थी, बदनाम कर देने वाली खुशबू थी। जीभ आगे बढ़ी, चटखारे लेते हुए चाटने लगी। क्लिट पर दबाव बढ़ा, चूसने लगा। ऊपर से आवाज़ें आईं - “आआहह… उउउ… स्स्स्स…” दीदी के होठों से नाम मेरा निकला - “रोहन… और… ईईई… हहह…” तरल मेरे होंठों तक पहुँच रहा था। तेज़ी से चूसा मैंने क्लिट को, जिससे उनकी आवाज़ें भारी हो गईं - “उउउफफ… रोहन… तू तो मेरी जान ले लेगा…!”
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कुछ देर बाद मैंने कहा, “दीदी, अब नहीं रहा जाता। मैं अंदर डालूँगा।”
दीदी हंस पड़ीं और बोलीं, “ठीक है, मेरे राजा। आ जा, अपनी बहन को चोद दे।”
ऊपर चढ़ते ही मैं उनके पास पहुँच गया। दीदी के हाथ ने मेरे लिंग को पकड़ा, फिर खुद की जघन की ओर ले गए। धीमेपन से मैंने अंदर घुसना शुरू किया। तंग गुफा में लिंग जाते ही ऐसा लगा, मानो सब कुछ भुला दिया जाए। सांस छूटी उनकी - “आआहह… उउउफफ… रोहन… धीरे… तेरा लंड बहुत बड़ा है…!” धक्के लगाए गए, धीरे-धीरे। हर झटके पर वे और तेज सांस लेने लगीं, “हहह… स्स्स्स… ईईई… और ज़ोर से…!”
मैंने तेजी से धक्के देना शुरू कर दिया। मेरा लंड उनकी चूत में आगे-पीछे हो रहा था। कमरे में हर झटके की आवाज फैल रही थी, “थप… थप… थप…” दीदी की चूत का पानी मेरे लंड पर लगातार बह रहा था। वो मेरे सीने से चिपकी रहीं, कभी अपने पैरों से मेरी कमर को घेर लेती थीं। मैं उनके बूब्स को चूसता हुआ, लगातार अंदर धकेल रहा था। उनकी सांसें अब चीखों में बदल गई थीं, “आआआ… उउउ… रोहन… ज़ोर से चोदो… और… ईईई…!”
कभी वो नीचे थीं, कभी ऊपर हो गईं। मेरा लंड उनकी चूत में घुट रहा था। मैंने उनके निप्पल पर फिर मुँह लगाया, तब दीदी और भड़क उठीं। उनके होंठ खुले, “रोहन… तू तो मेरी चूत फाड़ देगा… आआह… ज़ोर से…!”
थोड़ी देर के बाद उन्होंने कहा, "रोहन, अपना सामान बाहर निकाल। भीतर नहीं।" मैंने सुना, फिर आखिरी धक्के के साथ अपना लंड खींच लिया, जब वो भीग रही थीं। उस पल उनका पेट मेरे छींटों से भर गया। वो सांस फूल रही थीं, मगर आँखों में एक तरह की चमक थी। बोली, "तू तो बहुत अच्छा चोदता है।"
उस दिन के बाद सब कुछ अलग हो गया। पहले मेरे पास नौकरी अच्छी थी, फिर घर में भी सब कुछ संभल गया। जीजू ज्यादातर बाहर रहते, ऐसे में मौके आपने आप मिल जाते। अब तो ये भी समझ नहीं आता कि मेखला दीदी मेरी बहन हैं या फिर कहीं जीजू की पत्नी लगने लगी हैं।
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