भाभी की चूत चोदी
मेरा टोपा उसके होठों में आया, वो चूसने लगी। अंदर तक जाने से पहले ही रुक गया। मैं बोला -
लंड तो अभी काफी बाहर है मेरा, सुन ले यार।
वो बोला, "यार, ये कैसे होगा? तेरा सामान इतना लंबा है कि पूरा मुंह में भी नहीं समा रहा।"
मैंने कहा - चल, मैं धक्का लगाता हूँ। अब तू अपना मुँह खोल दे।
खोला उसने अपना मुँह। धीमे से घटित हुआ, मेरा लंड उतरा उसके गले में पूरा। कुछ पल के लिए ठहर गई उसकी सांस, जब मैंने छोड़ा सब कुछ आगे। बाहर निकालकर उसने बोला -
भाभी बोली – ये क्या कर रहे हो, सांस लेने भी नहीं दे रहे। थोड़ी छूट दो, मेरे मुंह को धीरे से चोदो न। अब मैं तुम्हारी पत्नी हूं, कोई गली की औरत नहीं कि इस तरह जबरदस्ती करो। मैं तुम्हारी ही हूं, ऐसा विश्वास रखो। फिर भी, बस इतना कहती हूं – अपना लंड प्यार से मेरे मुंह में डाल दो। मैं खुशी से उसे चूस लूंगी, ठीक वैसे जैसे तुम चाहोगे। जितना मन करे, पूरा मुंह घुसा लेना, पर थोड़े प्यार से। इतना ही काफी होगा, मेरे प्राण।
उसके होंठ मेरे लिंग पर थे, आवाज़ें बनती गईं। धीमे-धीमे तेज होती गई चाल। पानी भर आया अंदर, छलकने को तैयार।
मैंने कहा था उससे – मधु, मेरे लंड से पानी आने वाला है, अब क्या होगा।?
वो बोली, सुनिए ना, घबराइए मत। अब मैं ही आपकी पत्नी हूँ। मेरे ही मुँह में डाल दीजिए वो पानी। पहले खुद कहा था ना, लंड के पानी से चेहरे पर रौशनी आती है। फिर इतना समय क्यों गंवा रहे हो? बस, मेरे अंदर उड़ेल दो अपना पानी। मुझे पिला दो वो पानी।
मैंने तेजी से हिलाया, धीरे-धीरे उसके मुँह में डालता रहा। अचानक मेरा सारा पानी छूट गया, इतना कि वो सब उसके मुँह में नहीं रुका। तरल उसके कोने से टपकने लगा। कुछ घड़ी के लिए मैंने अपने लंड से उसका मुँह ढक दिया। मैंने उसकी सांस थाम ली, ताकि मेरा पानी बाहर ना आए। उसने सब कुछ निगल लिया, फिर बोली -
पानी कब देखा था तुम्हारे भाई का? आज पहली बार असली मर्द का स्वाद चखा। किसी और को छोड़कर तुम मेरे हुए, इसी से जीवन सफल हो गया। तुम्हारी बीवी बनकर मैं जन्म-जन्म तक रहूंगी, यही अब मेरा ठिकाना है।
थोड़ी देर हम आराम करने लगे। उसने मेरे लंड को मुंह में ले लिया, धीरे-धीरे चूसने लगी। जीभ ऊपर नीचे होने लगी, ऐसे जैसे सांप रेत पर सरकता है। मुझे अच्छा लग रहा था। फिर मैं बैठ गया बिस्तर पर, उसे अपनी ओर खींचा। वो नंगी जांघों पर आ बैठी, मेरे होंठों पर होंठ रख दिए।
मैंने धीरे से अपनी जीभ उसके मुँह में घुमाई। तब तक मेरा लिंग उसकी योनि में अंदर जा चुका था। उसे एहसास हो रहा था कि कैसे मेरा लिंग उसके भीतर घुस रहा है। वह बार-बार कह उठी - ओह्ह, हाँ… ह्ह्ह्ह, ऊऊऊउ, ऐसा लग रहा है जैसे मेरे पति का लिंग सीधे मेरे शरीर में उतर रहा हो।
भाभी बोली, सुनो न, इतना क्यों सता रहे हो? जल्दी से मेरे अंदर घुस जाओ। अब वश नहीं चल रहा मेरा खुद पर। वो लंबी छड़ तुम्हारी, मेरे नरम अंदर डाल दो। और बना लो मुझे अपनी प्रेमिका। उफ़, ऐ माँ, ये छड़ तुम्हारी मेरे अंदर झनझना रही है।
उसे गोद से उतारते हुए मैंने बिस्तर पर पटक दिया, फिर टांगें अलग कर दीं।
सच कहूँ तो, तेरी छाती पर हाथ रखकर महसूस किया - इतनी नाजुक त्वचा कहीं और नहीं देखी।
उसकी जांघों के बीच घने, महीन रोएं थे। हाथ डालते ही उसकी सांस भारी हो गई। आह… प्रभु, इतना न छेड़ो। सीधे शुरू कर दो। मुझे छू लो अपने शरीर से। धीमे-धीमे अंदर जाओ। गर्मी फैला दो मेरे पेट में। ओह, ऐसे ही चलते रहो…
उसकी सांसें तेज हो गई थीं, बोलते-बोलते ही रुक गई। मैंने एक पल भी नहीं गवाया, धीरे से उसकी चूत पर जीभ फेर दी। आवाज़ उठी - अअअअ, ओह, हाँ… अअअअ, ओह… मुझे ऐसा लगा जैसे मौज ले रहा था उसे चखकर। अब मैं जीभ को धीमे-धीमे उसके अंदर ले जा रहा था, वो कराह उठी।
पानी का स्वाद मेरी जीभ पर आगया, लवणता छाई रही। तबीयत में डल गई थी, फिर भी चखने में रस घुला रहा। उसके मुंह से निकला - अअअअ ओहओहओह, मैं तो ढह गई। ठीक उसी पल धमाके से बहाव शुरू हुआ। उसकी योनि से तरल रिस रहा था।
अब मैंने अपनी लंड को ऊपर उठाकर हिलाया, फिर उसकी चूत में डाल दिया। जैसे-जैसे अंदर गया, तंगी महसूस हुई, क्योंकि मधु भाई के बाद से कोई नहीं आया था। धीरे-धीरे सारा लंड उसके अंदर चला गया।
उसके मुँह से निकला - अअअ, ओह ओह्ह्ह… तू जो मेरा देवर था, आज मेरा पति बन गया है, अब मेरी चूत का मज़ा ले रहा है, मुझे रंडी बनाकर।
मैंने तेजी से धक्का दिया, उसकी योनि में। काँप उठी वह, आँखें फैल गईं। पैर थरथराए। अंदर तक लिंग पहुँचा, गर्भाशय तक।
उसने ऊंची आवाज में कहा - हे भगवान, इस लालची ने मुझे खत्म कर दिया। पेट के अंदर तक फाड़ डाला। ऐसा क्यों मारा, सीधा गर्भाशय में घुसा दिया लंबा लंड। ओ यार, थोड़ी तरफ रहम दिखा दे। इतना तेज धक्का मत मार, नहीं तो अंदर कुछ गड़बड़ हो जाएगा। धीमे-धीमे चल, बस, मैं तेरी ही हूं, कहीं और जाने का कोई विचार नहीं।
माफ़ करना, मैं थोड़ा बहक गया था। तुम्हारी चूत थोड़ी कसी हुई है, इसलिए मैंने बिना सोचे अंदर धकेल दिया।
उसके मुँह से निकला - अब तो पत्नी बना ही दिया मुझे, थोड़ा धीमे करो, इतनी जल्दी क्यों है, आराम से चलो ना, ऐसे क्यों घसीट रहे हो।
मैं आहिस्ता-आहिस्ता हिल रहा था, पर कभी-कभी झट से तेज़ मार देता उसके भीतर। अब वो ख़ामोश थी। शायद समझ चुकी थी कि मैं रुकने वाला नहीं। मैं तो ऐसे ही चलता रहा, अपना लंड घुमाता रहा। वो बस अब आवाज़ें निकाले जा रही थी। कभी चीखती, कभी सिसकती।
भाभी बोली – आह… हाँ, शिवम, मेरे पति, रुकना मत। जारी रखो, सख्ती से धकेलते रहो। मेरी गांड में घुस जाओ। इसे पूरा तबाह कर दो।
बस मैंने कहा - उसकी जानें दो हैं।
वो बोली - तुम चुप रहो, फिर आवाजें निकालते हुए अअअअ ओह अअअअ ओह कर दी। माँ की तरफ मुड़कर बोली, इसके साथ मेरी शादी पहले क्यों नहीं हुई? अब तक ये मेरी भोंसड़ी का क्या खेल है, इसे पता भी नहीं चला। लेकिन अब मुझे एक ऐसा आदमी मिल ही गया है जो मुझे उसी तरह की भोंसड़ी वाली बनाने वाला है।
अचानक से आवाज़ आई, ओह। किसी ने पुकारा, माँ। फिर वो शब्द बार-बार, चोदो। घबराहट में कहा गया, मेरा भोंसड़ा। एक सिसकी के साथ बोला, हाय मेरी चूत। आवाज़ कांप रही थी, ओह। फिर सन्नाटा छा गया।
उसके बोलते ही मुझ पर गुस्सा सवार हो गया। फटकार देते हुए मैंने पूछा - जल्दी बता, कहाँ छोड़ दूँ?
उसने कहा: क्या है वहाँ? मेरी गुदा में भर दो पूरा, फैला दो उसका मुँह। तुम्हारे लिए के पानी से डाल दो अंदर।
वह मेरे हिस्से पर झपटी। तभी मेरी जांघों को अपने पैरों से बांध लिया उसने।
मैंने कहा: अअअअ ओह अअअ ओह मधूऊऊऊ मधूऊऊऊ मेरी छाती धड़क रही है धड़क रही है अ अ अ अ अ अ अ।
मेरा लंड अंदर जोर से फूल रहा था। उसकी चूत लाल हो चुकी थी, बिल्कुल तमतमाई हुई। मेरा पानी उसके अंदर नहीं समा रहा था, बाहर टपक रहा था। मैंने उसे कसकर पकड़ रखा था। वो भी मुझे थामे हुए थी। मैं ऊपर था, वो नीचे। लंड गहराई में धंसा था। धीरे-धीरे मैंने उसके होंठ छू लिए। अपना थूक उसके मुंह में डाल दिया। उसने मुंह खोलकर सब कुछ ले लिया।
रात में हम दोनों बहुत पसीना आया। फिर धीरे से सीधे हो गए। मैंने अपना लंड उसकी चूत से बाहर निकाला। वो चूत खुली हुई थी, मेरा पानी धीमे-धीमे टपक रहा था। उठकर मैंने उसकी चूत से कुछ बूंद अपने पानी की ली, हथेली पर ली और उसके मुंह में डाल दी।
मैंने कहा - देखो, बस अपना मुँह थोड़ा खोल दो।
जब उसने मुँह खोला, मैंने अपनी उंगलियों से पानी छोड़ दिया अंदर। वो पी रही थी। मुझे ऐसा करते हुए बहुत अच्छा लगता है, तभी वो उठ गई। बिना कपड़ों के चली गई पानी लेने, दोनों के लिए। पीने के बाद हम एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
उसने पूछा - तुम्हारी नजर किस पर टिकी है?
मैं सिर्फ तुम्हें देख रहा था। कल तक आप मेरी भाभी थीं। अब आप मेरा लंड अपनी चूत में डाल रही हो। आज आप मेरी गणिका बन गई हो। मेरा पानी आपने पी लिया है। आपने मेरा लंड चूसा है। लगता है मज़ा आया होगा?
भाभी ने कहा, मज़ा आ गया तुम्हारे साथ। इतना प्यार तो पहले कभी नहीं मिला, तुम्हारे भैया ने ऐसा कभी नहीं किया। आशीष के जन्म के बाद हमेशा लगता था, एक बच्चा ही क्यों? पर अब ख़ुशी है, तुम्हारे कारण। अब रोज़ ऐसे ही मेरी चूत छेदना। अपना लंड गहराई तक धंसा देना मेरे अंदर। मेरी चूत को ढीला कर दो, ताकि वापस टाइट न बने। मैं अब तुम्हारी पत्नी हूं, जैसा तुम चाहोगे, मैं वैसे ही रहूंगी।
वहीं मेरे सिर पर खतरा सवार था कि कहीं किसी को झलक न मिल जाए कि भाभी की चूत मैंने ही तोड़ी थी, उसे गर्भवती बनाया था। फिर क्या होगा किसी ने जान लिया? भाभी से एक बात तय हुई – हमेशा आपस में ही यही करेंगे, इसी तरह बच्चे बनाएंगे। कभी-कभी वो भैया के साथ भी संबंध बना लेगी, ताकि कोई शक न करे।
उसके मुँह से निकला - अब तो बस तुम्हीं की बात है। क्या वाकई चाहते हो मैं किसी और के साथ भी ऐसा करूँ?
बस इतना कहा था – नहीं, फिर भी कई बार भैया के साथ ऐसा हो ही जाता। अंदर तुम्हारे पानी का छुपाया हुआ वो खुलेगा, वो मैं खुद निकालूँगा।
उसने हामी भर ली, बोली – सही है। फिर पूछा, “आगे क्या हुआ?”?
एक बज चुका है रात का समय। मैंने कहा था। अब थोड़ी देर विश्राम कर लो। फिर धीरे से तुम्हारे पिछले हिस्से में मेरा लिंग डालूंगा।
उसने कहा - पीछे हट जाओ, तुम्हें सुधरना चाहिए। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी गांड को और बड़ा बनाना चाहती हूं। तुम लोग जबरदस्ती करने वालों की तरह व्यवहार करते हो।
मुझे लगता है... अब तो बस, मैं वो नहीं करने जा रहा जो तुम्हारे साथ हो सकता था।
उसने कहा – चलो पिताजी, सही है, मार डालो बट। अब मैं तुम्हारी हूँ।
जब वो कपड़े पहनने लगी, मैंने उसे रोक दिया।
मैंने पूछा: ये क्या हो रहा है? बस सो जा। मैं अब तेरा पति हूँ, वैसे भी पति के सामने पत्नी ऐसे ही सोती है।
ठीक है, चलो पीछे-पीछे आ जाओ मेरे संग, नींद लेने का वक्त हो गया।
मैंने कहा था - चलो, अब सो जाओ, पर ड्रेस नहीं पहननी है। सुबह उठकर मुझे कॉफी देना, वो भी बिल्कुल खालीपन में।
उसके मुँह से निकला - अब आशीष को पता चल ही गया, है न?
थोड़ी देर रुकने के बाद मैंने कहा - जब वो उठेगा, तब तक तू मेरे लिए ये चीज तैयार करके ले आना।
उसके आँखें बंद हो गईं। मैंने धीरे से उसके होंठों पर छुआ, एक नहीं, तीन बार। सब कुछ शांत हो गया।
अगले हिस्से में मैं बची हुई कहानी सुनाऊँगा, जब मैं मधुी की चूत चोदने लगा था।
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