उसने अपनी छोटी बहन का शरीर उठाया।
एक दिन की बात है, मेरा नाम ह९री है। तीन भाई-बहन हम लोग, मैं, एक शादीशुदा बहन और एक अविवाहित। कुछ हफ्ते पहले की बात है, घर में सिर्फ मैं था और मेरी छोटी बहन। आधी रात के करीब, मैं बिस्तर पर पड़ा था, आँखें बंद थीं। अचानक सुनाई दी उसकी आवाज, बाथरूम में नहाते हुए।
लंड पहले से ही खड़ा था, ऐसे में यही लगा कि आज कहीं न कहीं छेद मिल ही जाएगा। माँ का घर पर होना भी नहीं था।
आधी नजर से बाथरूम के दरवाजे के पीछे झांका, तभी ज्योति की चूत दिख गई। लड़के का लंड फौरन खड़ा हो उठा। अब इच्छा हुई कि उसे चूत में घुसा दे। वह धीरे-धीरे शरीर साफ कर रही थी, तभी मैं भीतर आ गया, सो रहा हूँ ऐसा ढोंग करने लगा।
अँधेरे में ज्योति का धुंधला सिलूएट दिखा। वो समझी कि मैं बिलकुल सुबुद्ध हो चुका हूँ। तभी वो तौलिये में लिपटी अंदर आई। नीचे सिर्फ ब्रा और पैन्टी थीं। लाइट बंद थी, शायद इसलिए उसे लगा कि कोई झिझक नहीं। मैं चुपचाप उसे घूर रहा था। उसने पहले स्विच छुआ, रोशनी फैली। फिर झांक कर देखा - कहीं मैं जाग तो नहीं गया? मैं तो बस आँखें बंद किए पड़ा था।
उसे विश्वास हो चुका था कि मैं सो रहा हूँ, इसी बीच उसने तौलिया पूरी तरह हटा लिया। देखते-देखते मेरी नजर ठहर गई - उसका रंग दूध जैसा था।
उसके शरीर पर क्रीम का लेप बन रहा था। मैं आहिस्ता से उठा, पीछे जाकर खड़ा हो गया। फिर वही दृश्य - क्रीम लगाने का क्रम जारी। मेरा लंड सिर्फ एक चीज़ में लगा था - चूत। अब कुछ भी हो, उधेड़बुन में था मन, पर झट से शॉर्ट्स से लंड बाहर निकाला मैंने, और उसकी गांड पर घिसने लगा।
जैसे ही वो मुड़ने लगी, मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। अब सिर्फ खड़े रहना बचा।
उसने कहा - भाई, ऐसा मत करो… इसमें पाप है।
मैंने कहा, कोई कुछ नहीं जान पाएगा, तुम बस खामोश रहो। मैंने उसे उठाया, अपने बिस्तर पर ले आया। ऊपर से चादर ओढ़ ली, उसे भी, खुद को भी। फिर मैंने धीरे से अपने कपड़े निकाले। इसके बाद उसकी पैंटी और ब्रा हटाई।
ज्योति मेरे बगल में बिस्तर पर लेटी थी, कपड़े उतारकर। मैं धीमे से उसके होठों पर होठ रख रहा था। वो मेरे लिए अपने हाथों से छू रही थी नीचे की तरफ। छोटी-छोटी बूँदें आहिस्ता आहिस्ता निकल रही थीं मेरे लंबे हिस्से से। मैंने उसकी ओर देखा, फिर बोला - ज्योि, तू कभी किसी के साथ नहीं रही, तेरे भीतर का हिस्सा तंग होगा, मेरा लंबा और मोटा है। चोट लगेगी, सह लेना, खून भी आएगा। इतना ही कहना था मेरा।
फिर उसने हाँ कर दियa, मैंने प्री-कम उसकी चूत पर लगाया, धीरे-धीरे लंड अंदर गया।
उसकी चूत काफी तंग थी, दर्द महसूस हो रहा था पर वो लड़खिसी नहीं रही।
उसने कहा - भैया, क्रीम तो देखो, नहीं है तो फ्रिज से देसी घी ले आओ। घी निकाला मैंने, थोड़ा अपने लंड पर लगाया, उसके बाद उसकी चूत पर भी फैलाया। फिर आहिस्ता-आहिस्ता लंड उसकी चूत में धंसाने लगा।
लंड अंदर गया, तभी मन में ऐसा जैसे कहीं ऊपर पहुंच गए हों। ज्योति को दर्द से आंसू आ रहे थे, इसलिए मैंने उसके स्तन दबाए, फिर चूसना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसे सुख महसूस होने लगा। दस मिनट बाद वह बोली - भैया, आधा लंड तो अभी बाहर है, तुम्हें मज़ा आ रहा है?
कहा मैंने - ज्योति, तुम्हें दर्द हो रहा है, सच बताओ?
फिर ज्योति ने कहा – भैया, मुझे तकलीफ तो होगी ही। चाहे सब कुछ खत्म कर दें, दर्द वही रहेगा जो अभी है।
फिर उसने कहा - भैया, अगर बस इतना ही करना है तो पूरा डाल दो अंदर। सिर्फ़ मेरे मुंह पर कुछ ऐसे दबा दो कि आवाज़ बाहर न आए।!
"ठीक है!" कहते ही मैंने अपने मुँह उसके मुँह पर रख दिया। धमाके से मेरा पूरा लंड ज्योति की चूत में घुस गया। उसकी चीख मेरे होठों पर थम गई। झटके के साथ उसकी चूत की परत फट गई। खून निकलने लगा।
थोड़ी देर हम वैसे ही पड़े रहे, इसके बाद मैंने अपने लिए धीमे धीमे आगे-पीछे करना शुरू कर दिया। 20 मिनट बीत चुके थे, मंजिल अभी काफी दूर थी। मैं ज्योति के ऊपर चढ़ गया, फिर चुदाई शुरू हो गई। शुरुआत में तो ज़ोर लग रहा था, पर धीरे-धीरे गति बढ़ी और मज़ा भी आने लगा। सुबह के छह बज रहे थे, दोनों भाई-बहन मियाँ-बीवी जैसे उलझे हुए थे।
ज्योति के चेहरे पर खुशी साफ़ झलक रही थी। कमरे में उसकी और मेरी धड़ाम-धड़ाम की आवाज़ हर तरफ फैल रही थी। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सपना सच हो रहा हो। उसकी चूत में घुसते हर झटके पर एक अजीब सी तेज़ी थी। इतने देर तक हम ऐसे ही जुड़े रहे। पचास मिनट बीत चुके थे। तभी उसकी आवाज़ आई - भैया, मेरे अंदर से कुछ टपकने वाला है।
बूँद-बूंद करके ज्योति की चूत से पानी टपकने लगा। उसके अंदर अभी भी मेरा लंड था, शांति से लेटी हुई थी वो।
तभी ऐसा लगा जैसे मेरा भी खत्म होने वाला है। फिर मैंने तेजी से काम करना शुरू कर दिया। हर बार धक्के लगाने लगा। अचानक गर्मी आई, और छलांग लग गई। गर्म चीज निकल पड़ी। वो सब ज्योति के अंदर जा गया। उसके साथ मेरा भी चिपकाव हो गया।
उस दिन के बाद हम दोनों, एक लड़का और एक लड़की, आधे घंटे तक पलंग पर पड़े रहे।
मेरा लंड अब भी उसकी चूत में था, धीरे-धीरे दोबारा खड़ा हो रहा था। ज्योति को भी फिर से चुदवाने का मन था। हम दोनों ने इशारों में सहमति दिखाई। एक बार फिर तेजी से चल पड़ी चुदाई।
उस दिन के बाद मैंने ज्योति के साथ ऐसा दस बार किया है। वह गर्भ निरोधक गोलियाँ लेती है, क्योंकि मुझे कंडोम के बिना संबंध बनाना अच्छा लगता है। और अब तय है - इसके आगे कभी नहीं।!
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