उसने शाम को गलती से बहन के साथ संबंध बना लिए

Jan 14, 2026 - 12:06
Jan 15, 2026 - 17:34
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उसने शाम को गलती से बहन के साथ संबंध बना लिए

मैं आकाश हूँ। एक महीने पहल ी हु है मेरी। मोना,  पती, का ुंदर है। उसका शर ऐसा है ि नजर ठहर जा ै। 32-28-34 का फिगर,  रं, ी ब्लाउज से ़ी झांकती हैं, मानो  ीं रही हों। दिमा लगा रहता है उस  ा। उसके दर  िा इतना कसा हु ै कि रोज चढे के बाद भी  नहीं बदला। रात  हम ितर पर उलझ े हैं, कभी मन े, कभी  े। वो भी डरत नहीं, आहें निकालती है, ऊह  आवाज में,  ुझे और बढ़ा देती है।

एक बहन है मेरी, सिमर   से। पंद्रह दिन पहले उसक ी हुई थी,  ी से बस इतन सला। उम उसक ईस ाल है, और घर ें ो कुछ दिनों के लिए ठहरी हुई ै। सिमर भी कम ियत ाली नहीं है। 34-26-36  िगर है उसका, ़ा ादी औरत की तरह सजघर ें रहती है। मोना े सा उसक ंदा़ एक जैसा - लहंगा, चोली, दुपट्टा और पायल पहनती दोों। दोनों इतनी सम लगती हैं कि धुंधलके में पहचनना मुश्किल हो जा

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रात के आठ बजे  समय ा। अचनक इट चली गई। घर  दर षण गर्मी थी, इसलि मैं ऊपर  ओर चल िा। छत पर  बिछाकर  गया, शराब की बोतल निकाली, िर एक ि पेग बना लिया। नीचे मोना बरतन   खाना बना रही थी। मन में ख् आया - खाने के बाद उसके  ़रू  करूंगा। उसकी गोल ि देखकर मेरा लिं सद कड़ा हो उठत ै। अचनक सीढ़ियों  खर-खर की आवाज़ आई। लग ि मोना ी आ रही है। पिछल ेग तभी खत्म  था, नशा ा चढ़ चुका था।

़ी  में वो मेरे पास आई,  ें नमक   ि। बोली, "ले,  े।" मैं हं पड़ा, ि हि ुए ा, "इतनी देर ? जब शर खत्म हो ी, तब  आई?" उसके हाथ ो पकड़कर खींच लिया ास। े से  पर ाथ रख िया। साड़ी के ऊपर से ी उभरी िां महस हो रही थीं। ोला, "हर रोज    ऐस कर ेती ै, िसस बदन िसटन लगत ै।" आव ारी हो गई ी। ब्लाउज े हुक एक-एक कर खु गए। ी बाहर आईं - गोल, 34D, नरम, बीच में गुलाबी निप्पल। मैंने एक को मुंह में ले िया। चूा।

उसने अचानक ा, “ये क्या कर रहे हो?” मैंने कहा, “चुप रह, कहीं कोई सुन ले। दस मिनट में तेरी चूत का   कर दूंगा।”  अंधेरा था, नशे में कुछ समझ नहीं  रहा था। उसका पेटीकोट ऊपर िया, पैंटी े खीं दी, चारों ओर ांका - कोई नजर नहीं आया। फिर मैंने अपना 7 इंच का लंड निकाला, जो पहले से खड़ा था। उसकी चूत पर लगाया, एक ेज धक्का िा। “आह…” उसकी ी से आव निकली। मैं हंस पड़ा, ोला, “अब ी, फट गई क्या? आज तेरी चूत और भी टाइट लग रही है।  पहल  थी ि ी।”

छत पर फच-फच  आव ूं उठी। मैंने जोर से धक्के ा शुरू कर िा। हर झटक ें   और सख  उठता। उसकी चूत इतनी कस  थी कि सब कु तन गया। ों हाथों े मैंने उसकी चुचियों को ा, निप्पल को  े दबाया। वो - आह…ऊह… करन लगी। मैंने कहा - “ी चूत इतन इट े है? आज तुझे  ि ूंगा।” तभी मैंने ी से दन  कर दिा। उसकी सिसकियाँ एक-एक कर तेज हो लगीं। “आह… आह… धी करो… भैया…” उसकी आवाज सुनकर मैं िठक गया।

“कौन? सिमर?” मैंने चौंककर पूछा। वो बोली, “हां भैया, मैं सिमर। भाभी ने कहा था कि नमकीन ऊपर दे आओ। और आपने… ये क्या कर दिया?” मैंने कहा, “अरे, ये क्या हो गया? तू तो चुप थी!” वो हंसते हुए बोली, “भैया, जो हुआ, अच्छा हुआ। मुझे तो मजा आ गया। काश, मुझे भी ऐसा लंड मिले। मेरे पति का तो छोटा सा है, बमुश्किल 4 इंच।” उसकी बात सुनकर मुझे गुस्सा भी आया और जोश भी। मैं समझ गया कि सिमर भी चुदक्कड़ है। उसे भाई से चुदने में कोई शिकायत नहीं थी।

फिर वही छन-छन की आवाज ़िों  ऊपर आई। मोना ऊपर आ रही थी। सिमर ने झट से पैंटी पहनी, साड़ी समी। मैंने भी लंड पैंट में डाला। मोना आई, बोली - “अब क्या चल रहा है? अंधेरे में भाई-बहन गपशप लगा रहे हो? यद ससुराल के िस् ुना रहे हो?” मैंने कहा, “हां, िर् इसी बा ें ात  रह ी।” उस वक मेरा फोन बज उठा।  मेरे ससुर की ओर े थी। मोना ने फोन उठाया, फिर मे  ें दे िया, बोली, “पापा आपसे बात करना चाहते हैं।”

मैंने नमस्ते किया। ससुर जी बोले, “बेटा, कल सुबह हम वृंदावन जा रहे हैं। सोचा, मोना को और तुम्हें भी ले चलें।” मैंने कहा, “पापा जी, कल मुझे पलवल में कुछ काम है। मैं नहीं जा पाऊंगा। मोना को ले जाइए।” मोना ये सुनकर खुश हो गई। वो बोली, “ठीक है, मैं मम्मी-पापा के साथ चली जाऊंगी।” मैंने मन ही मन सोचा, “कल घर खाली होगा। सिर्फ मैं और सिमर। बस, अब तो उसकी चूत का पूरा मुआयना करूंगा।”

अगली सुबह, तय कायकरम ऐसे हुआ  पहल  गय ा। मोना सा बजे बह माँ-ाप के साथ वृंदावन िकल पड़ी। उधर, ाँ  घर े मम्मी-पापा भी पहुँ गए। इस तरह घर में मैं और सिमर अके रह गए। दरवाजे  ैंे सावध   कर लिया, ि सिमर के पास चला गया। वह अभ  उसी लाल साड़ी में थी, जो रात भर पहने थी। मैंने  े उसे गोद में उठाया, बेडरूम में ले जाकर पलंग पर िा दिया।

उसकी साड़ी ैं पकड़ी, धीरे-धीरे िों तक   गई। खुलते कपड़े ऐस लगे, ो कोई पु  पस  रही हो। ब्लाउज इतन  था कि दर ी बातें छलां लगाने लगीं। एक ांका खुला, िर सरा, और ि सरा... आखिरक उसक ी सामने आई - गोल, सफ, ीचे गुलाबी नि  िि। मे ुं े निकला, "सिमर, तेरे ऊपर तो आदम मर ।" वो िसकी, ेंपते हुए बोली, "भैया... इतन जल्दी मत करो, कहीं को   ।" ैं आसप देखा, ि कहा, "घर में अब  ै? बस तू और मैं। आज तेरे शरीर  हर   ंगा।"

उसका पेटीकोट ैं े उतार िा। दर ी पैंटी नम थी।  े खींचकर  ी उतार ी। सामने थी उसक  - गुलाबी, साफ, ़ी तरबतर। मैं ा, “सिमर, तेरी चूत बहुत अची है। कितनी कसी हु ै!” वो बोली, “हां भैया, मेरे पति का लंड छोटा है। वो ो दो मिनट में  खत ो जाते हैं।” सुनत ी मेरा 7 इंच का लंड और सख ो गया। मैंने उसकी ांें अलग ीं और चूत पर ुं  कर चाटने लगा। मेरी जीभ उसके चूत के ऊपर िे को छू रही थी। वो ार- िसकने लगी, “आह… भैया… ऊह… इतन अच लग रहा है।”

मे  उसकी चूत में  रह ी, आगे-े हो रही थी। उसका  मेरे मुँह में  गया। वो - चिल्ला लगी, “आह… भैया… ऐस   रखो… ऊह…” ि मैंने अपनी दो उंगलियां उसके अंदर धक ीं,   िे लगा। वो करवट बदल रही थी, “भैया… अब  … लंड दर कर दो… बस…” मेा लंड ि्कुल सख ो चुका था। मैंने उसके चूत पर अपना लंड रखा, उसकी ी पकड़ ी, और एक झटके में दर  िा।

"आह…" सिमर चीी। मेरा पूरा लंड उसकी चूत में  गया। कमर ें फच-फच की आवाज भर गई। मैं धक्के  लगा। हर झटके के साथ उसके तन ि रहे थे। मैं ोला, "इस लड ी चूत तो अद है। कितनी  है!" वो बोली, "भैया... और ेज... मुझे ो... आह... ऊह..." मैं और   गया। उसकी चूत मेरे लंड को  रही थी। मैंने उसकी एक ां ऊपर उठाई, िर कि  ा। वो चिल्ला, "आह... भैया... मेरी चूत फाड़ दो... ऊह..."

मैंने उसे घोड़ी बना िया। सामने थी उसकी गां - ोल, नरम, कमाल की। एक तमा मारा ैं उसक िछल ओर। वो बोली, “भैया… ये क्या  रह ै?” मैंने कहा, “आज तेरी गांड भी चलेगी।” अपन  ि े उसकी चूत में डाला, जोर से धक्के  लगा। कमरे में गूंज रही थी फच-फच आह ऊह… की आव। पीछे से पकड़ा उसक ि, दबे लगा। वो अपनी गांड ऊपर उठा रह ी, चुदवा रही थी।

मैंने कहा, "अब सिमर की बारी ै।" उसक हर पर डर  गया, ि बोली, "भैया, धीरे... मैंने ऐस पहले कभी नहीं िा।" मैंने उसकी   े तेल लगाया, अपने ऊपर भी ाया, िर आहिस्  दर  िा। वो झट े चिल्लाई, "उह… भैया… बह दर्द हो रहा…" मैंने कहा, "थोड़ी   सब   एगा।" धीरे-धीरे आग   लगा। शुरू ें ंग लग रहा था, लेकिन ़ी ेर   पडे लगा। वो सां रो  थी, ि ी, "ऊह… ाँ… भैया… अब अच लग रहा है।"

ी से धक लग लगा। मेरा ोड़ा उसक िछल तरफ अंदर-बाहर हो रहा था। "भैया... जोर से... आह..." - ि  ी। कमर मकर ीं-ींचकर मारन लगा। कमरे ें िसकहटें और ेज आवाजें सु े रही थीं। िर एकदम  ो गया। तर तक मेरा  जम ो गया। वो भी ढहकर ितर पर गिर पड़ी।

हम दोनों ने कपड़े पहने। वो बोली, “भैया, ये गलत था… लेकिन इतना मजा पहले कभी नहीं आया।” मैंने कहा, “सिमर, ये हमारा राज रहेगा।” तभी दरवाजे की कुंडी बजी। मैंने जल्दी से गेट खोला। मोना वापस आ गई थी। वो बोली, “अरे, इतनी जल्दी वापस आ गई। पापा का काम जल्दी खत्म हो गया।” मैंने कहा, “अच्छा हुआ, आ जा।”

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