बारिश में भीगी साली की चूत चोदी
Barish mein bhigi sali ki chut chodi
लगभग हर दिन मैं भी वैसी ही कहानियाँ पढ़ता हूँ जो आप पसंद करते हो। इतना तय है, मेरे हाथ भी कई बार ऐसी लाइन्हें पर गए हैं जो धीमे दिमाग को झकझोर दें। आज कुछ ऐसा ही एक पल याद आया, जब मैंने कुछ ऐसा पढ़ा जो मन में घर कर गया।
छुट्टियों में मैं ससुराल पहुँचा, बड़ी साली के घर। एक साल बाद फिर वहीं कदम रखा था मैंने। तभी ससुर जी का फोन आया, पत्नी के पास।
उसने फोन किया, बोला कि किसी लगते-जुड़ते का अंत हो गया है। तुम गीता के पास से निकलकर यहाँ पहुँच जाओ। इसके बाद हम एक साथ रवाना होंगे।
गीता मेरी बड़ी साली है। उदय, जो आर्मी में नौकरी करते हैं, वो उसके पति हैं - घर तो शायद ही कभी आ पाते हैं। अब तक कोई बच्चा नहीं हुआ उनका, हालाँकि शादी के चार साल पूरे हो चुके हैं।
उदय जी की शादी से पहले ही आर्मी में तैनाती हो चुकी थी, तो गीता के साथ समय बिताना मुश्किल हो गया। मगर एक दिन गीता बाज़ार जा रही थी, और उससे पहले मैंने उसे कभी अलग नज़र से नहीं देखा था।
बारिश के साथ ही मन भटकने लगा। मैं फिल्म के झटके में था, धीमे-धीमे विचारों का रुख बदल रहा था। छत पर पानी की आवाज़ के बीच कुछ पल ऐसे भी आए, जब दृश्य थोड़े गर्म हो उठे।
अचानक मन भर के उछल पड़ा। हाथ आपने आप लंड को छूने लगे। तभी दरवाजे पर बेल की आवाज आई। पल भर में सारा शांतिपूर्ण माहौल टूट गया।
लगने लगा कि किसी की नज़र मुझ पर है... फिर याद आया, इस घर में अकेला हूँ मैं। बस, ख़्वाबों ने डरा दियa था।
दरवाजा खोलते ही नजर पड़ी गीता, बाहर खड़ी। बारिश में भीग चुकी थी वो पूरी तरह, फिर भी आज उसकी छवि मुझे कहीं अधिक ताजगी दे रही थी, सामने खड़ी होकर।
पीछे मुड़ते ही नज़र पड़ी गीता की कमर पर - दरवाज़ा तभी बंद किया था मैंने। गुलाबी साड़ी के ऊपर का हिस्सा ढीला था, इसलिए अंदर की काली ब्रा साफ़ देखी जा सकती थी।
गीता के हाथ में सामान था, वह सोफे पर डालकर बोली - राजा जी, बारिश में तमाम शरीर गीला हो गया है। अंदर से कोई तौलिया निकालकर दे दो।
हाथ में तौलिया लिए मैं वापस आया। गीता मुस्कुराई, फिर बोली - इतना सामान पकड़े-पकड़े मेरे हाथ लकवा हो गए हैं, तो क्या तुम एक छोटी सी चीज़ कर दोगे?
काम क्या है, मुझे बता।?
पानी के बाल सूखने में हल्के हाथ से कंघी कर दो।?
क्या मैं? नहीं हो पाऊँगा।
बारिश के बाद की तरह गीता के बालों से पानी टपक रहा था। सोफे पर जगह बनाकर वह बैठ गई। मैं चुपचाप उसके पीछे आकर बैठ गया। उसके गीले बाल मेरे हाथों में आए। धीमे-धीमे तौलिए से साफ़ करने लगा। छोटी-छोटी बूंदें उसके गालों पर से फिसल गईं।
गीता के गोरे शरीर पर पसीना आ गया, मेरे पैरों में एक सिहरन-सी दौड़ गई। बाल सुखाते समय मैंने आहिस्ता से उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
जब गीता ने कुछ नहीं कहा, तो मैंने धीरे-धीरे उसकी कमर पर हाथ फेरना शुरू कर दिया।
गीता – अब तो मेरे बाल सूख चुके हैं। घर के भीतर जाने का वक्त आ गया है।
उसके कमरे में जाते ही मेरी सांस थम गई। लगा, शायद गीता को एहसास हो गया है कि मन में क्या चल रहा है। भीतर जाकर उसने कपड़े बदलने शुरू कर दिए।
गीता ने दरवाज़ा ढीला छोड़ दिया था, फिर वो मिरर के सामने आकर खड़ी हो गई। खड़ी होकर उसने धीमे से हर कपड़ा उतारा। उधर, मैं चुपचाप देख रहा था - वो अपने शरीर पर नज़र घुमा रही थी, बड़े आइने में। ऊपर से लेकर नीचे तक, एकटक टकटकी लगाए हुए थी वो।
अब मेरा दिल और भी उठने लगा था। बारिश का मौसम ऊपर से ऐसे झोंके मार रहा था, जैसे पानी की बूँदें चमड़ी के अंदर तक जलन पैदा कर रही हों। इस बार गीता ने मुझे देखा, फिर टाल दिया - शायद वो मेरे लिए हामी का निशान था।
अचानक मैं उसके कमरे में पहुँच गया। गीता ने कहा, सुनो राजा, मेरे ऊपर अभी कुछ नहीं है, तुरंत वापस बाहर खिसक जाओ।
गीता मैं तुम्हें हमेशा कपड़ों में देखता रहा हूँ। पर आज तुम्हारा वो रूप सामने था, जिसे कभी नहीं देखा था। अब फैसला तुम्हारे हाथ में है - चाहो तो इसी लिबास में रह सकती हो।?
फिर मैंने कहा और उन्हें गले से लगा लिया। वो झिझके थोड़ा, पर मैंने ठहरने नहीं दिया। मौका मिलते ही मैंने चुंबन शुरू कर दिया। तभी ध्यान आया - गीता की पलकें नीचे थीं।
उसकी सहमति इसमें झलक रही थी। पूरे दस मिनट मैं उनके होंठों से चिपका रहा। तब तक मेरे तपते होंठ उनकी सफेद, सूखी खाल के हर कोने पर फिर रहे थे। एकदम से गीता ने धक्का देकर मुझे ज़मीन पर गिरा दिया।
एक पल को तो घबरा गया मैं, मगर फिर देखा कि गीता मेरे ऊपर आके लेट गई है। धीरे-धीरे सारे कपड़े मेरे उतार चुकी थी वह। अब कोई कपड़ों की बाधा नहीं थी हमारे बीच।
लंड सीधा खड़ा था, पूरी तरह तना हुआ। फिर उसके होठों ने उसे छू लिया, गर्माहट में घिरा हुआ। मुँह में ले लिया उसने, धीमे दबाव से चूसा। वो ऊपर बैठी, ऐसे कि चूत मेरे होंठों से चिपक गई।
मैंने उसकी चूत को पागलों की तरह चूमना शुरू कर दिया। अब मेरा लंड उसके मुँह से बाहर था, वहाँ से आवाज़ें आ रही थीं - अह्ह, अह्ह, स्सी।
उसकी चूत से पानी छूट गया। फिर वो बोली, "अह्ह... मेरी चूत को तुम्हारे लंड के बिना घटिया लगता है। अपने खिलाड़ी को मेरी चूत में उतार दो, जिससे दोनों एक-दूसरे के साथ चुदाई कर सकें।"
गीता को अब मेरा लंड चाहिए था, वह बेकरार हो रही थी। उसी पल मैंने उसे जोश में उठाया, बाहों में खींच लिया। फिर धीरे से बिस्तर पर लिटा दिया। उसकी चूत में नमी छा चुकी थी। मैं उसके ऊपर आधा झुका, शरीर सट गया।
मेरा लंड धीरे-धीरे गीता की चूत तक पहुँचा। उसने अपने हाथों से चूत को फैला दिया, वहीं से मैंने आगे बढ़कर लंड अंदर डाल दिया।
काफी समय बाद गीता को पूरा करने का मौका मिला। धीमे स्पर्श के बजाय मैंने अचानक आगे बढ़कर कदम रख दिया, तभी छुपी हुई गर्माहट के बीच मेरा हिस्सा उसके भीतर समा गया।
आह... गीता के होंठों से धीमी सी आवाज़ फूट पड़ी। थोड़ी देर पहले उसने मुझे हिलने से रोक दिया था। फिर अचानक, वो खुद धीरे-धीरे झूलने लगी।
मुझे अब साली की चूत में मज़ा आने लगा था, फिर मैंने गीता पर ध्यान डाल दिया। इतनी तेज़ी से मैं उसके ऊपर झोल रहा था, उतनी ही बेसुध आवाज़ें वो छोड़ रही थी।
लगभग आधे घंटे तक हम दोनों ने साथ में संबंध बनाया। फिर गीता ने मेरे साथ ज़ोर से चिपककर रखा। उसकी चूची कुछ पलों के लिए तंग हो गई। कुछ और धक्के लगाने के बाद मेरे लिंग से पूरा वीर्य बाहर आ गया।
गीता अब मेरे से चिपक गई। ऐसे ही दस मिनट तक मैं उसके ऊपर झुका रहा। बारिश के उस दिन से लेकर आज तक, हर रात वो खुश तन उसके लिए सिमट जाता है।
कभी-कभी मैं मीटिंग बनाकर वहाँ पहुँच जाता हूँ, वैसे कई दफा वो भी अपनी बहन से मिलने हमारे घर आ जाती है। फिर ऐसे में मौका मिलते ही मैं उसके साथ सेक्स कर लेता हूँ। इस कहानी पर आपको क्या खयाल आया?
एक बात ज़रूर कहना। इस लॉकडाउन में वो भी नहीं हो पा रहा, जिसके लिए साली के पास जाना होता था। अब तो घरवाली से ही सब कुछ निपटा रहा हूँ।
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