एक पड़ोस की अविवाहित लड़की से दुष्कर्म हुआ।
एक गोरे पड़ोसी की बात सामने आई।
शैलेश मैं, रहता हूँ देहरादून में। इस कहानी पर समय बिताएगा तो शायद सब कुछ समझ में आए। ज्यादा बातें नहीं करूँगा, लेकिन वो पल जब ज़िंदगी बदल गई, उसे छुपाऊँगा भी नहीं। पहली बार की बात है, हाँ, पढ़ी-लिखी कहानियों से हौसला मिला है। गलतफहमी हो तो वो माफ हो।
मेरी हाइट 5 फुट 6 इंच है, उम्र उस समय 21 साल थी। मैं झूठ नहीं बोलूँगा, मेरा लंड 6.8 इंच का है, मोटा और मजबूत। बॉडी फिट और आकर्षक है। अब आते हैं अमृता पर, मेरी पड़ोसन। वो इतनी हॉट और सेक्सी थी कि कोई भी देखता तो दीवाना हो जाए। कपड़ों में उसके छोटे-छोटे बूब्स भी कातिल लगते थे, पर नंगे देखकर तो पागलपन छा जाता था। उसकी मटकती हुई गज़ब की गांड, गोरा रंग, पतली कमर और भरा हुआ बदन। साइज़ था 34-26-36। उसकी किलर स्माइल और आँखें बस दिल लूट लेती थीं।
यह बात लगभग छह साल पुरानी है, उस वक्त अमृता की उम्र महज 18 साल थी। उस उम्र में उसकी जवानी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी, और शरीर में इच्छाओं की खुजली शुरू हो चुकी थी। एक दिन मेरे माता-पिता अचानक कहीं बाहर चले गए थे। घर के बाहर कुछ पड़ोस की औरतें बैठकर बातें कर रही थीं। मैं मैगी का पैकेट लेकर बाहर जा रहा था तभी एक आंटी ने पूछा – “बेटा, दिन में खाना छोड़कर मैगी क्यों खा रहा है?”
मैंने कहा, “आंटी, आज घर पर कोई नहीं है। मम्मी-पापा बाहर गए हैं। सब्जी तो बना लेता हूँ, पर रोटी नहीं आती।”
तभी अमृता की मम्मी बोलीं, “रुक बेटा, मैं अमृता को भेज देती हूँ, वो रोटी बनाकर दे आएगी।”
मैंने मना कर दिया, फिर भी वो नहीं रुकीं। कहा, "थोड़ी देर में भेज दूँगी"। अंदर चला गया। दस मिनट के बाद दरवाजे पर आवाज़ आई। खोला तो वहाँ अमृता खड़ी थी। लाल शर्ट और नीली टाइट जींस में वो ऐसी लग रही थी, मानो कहीं से उतर आई हो। उसके सीने टॉप में साफ़ झलक रहे थे, कमर एकदम नज़र आ रही थी। मैं उसे ऊपर से नीचे तक घूरता रहा।
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अचानक वो कमरे में घुसी, हल्के से मुस्कराई। “पहले आटा गूँथने दो,” उसने कहा।
सीधी सी लड़खड़ाती हुई वो रसोई में घुसी। मैं उसके पीछे खिसका। उसने पूछा - “आटा कहाँ है, सामान के साथ?”
आटा निकाला मैंने। धीमे से टेबल पर रखकर वो गूँथने लगी, नीचे की ओर झुकते ही उसके बूब्स के बीच का गहरा फासला साफ दिखा। गुलाबी ब्रा की धार आई नजर, थोड़ा सा झांकता हुआ हिस्सा। मेरी आँखें चिपक गईं वहाँ। हवा में तैर रही थी उसकी खुशबू, जैसे बॉडी स्प्रे का हल्का छींटा और ताजगी का मिश्रण। अंदर से तय हो गया, आज ऐसे नहीं छोड़ूँगा।
रोटी बनाने लगी वो। मैं सोफे पर जा बैठा, टीवी चालू करने का बहाना बनाकर, फिर भी आँखें उधर ही थीं। कमर का मटकना, पिंडलियों में हल्की सी डगमगाहट। सहन न हुआ मेरे से। धीरे-धीरे पीछे आया, फिर कमर पर हाथ डाल दिया। झटके से मुड़ी, “अरे शैलेश… ऐसे कैसे? छोड़ो अभी… कोई देख लेगा!”
उसकी सांसें तेज हो चली थीं, लेकिन आवाज़ में सिर्फ डर नहीं झलक रहा था। मैंने कान के पास मुंह ले जाकर कहा, “अमृता, कोई नहीं आएगा। हर कोई जानता है तुम रोटी बनाने मेरे घर आई हो। किसी को कोई संदेह नहीं होगा।”
वो शर्मा गई, आँखें नीची कर लीं। मैंने उसकी कमर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुम इतनी सेक्सी हो कि मुझसे अब रहा नहीं जा रहा। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।”
वो धीरे से बोली, “हाँ… मुझे भी तुम बहुत पसंद हो… पर शादी…”
मैंने उसकी बात काटी, “वो बाद में देखेंगे। पहले ये बता, मुझे सच में प्यार करती हो?”
उसकी आवाज़ में एक हल्का सा झिझकना था, "हाँ... अक्सर करती हूँ।"
एकदम तुरंत मैंने उसके होंठों को अपने से छुआ लिया। पाँच मिनट तक बिना रुके चुम्मा लिया गया। मेरी जीभ उसके भीतर घूम रही थी, उसकी जीभ मेरे साथ लड़ रही थी। मेरे हाथ उसकी पीठ, कमर, कंधे पर फिसल रहे थे। उसकी सांसें धीमी-धीमी पर गर्म हो गईं, शरीर हल्का सा डगमगा रहा था। वो बोली, “उम्म्म… शैलेश… आह्ह…”
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उसकी टी-शर्ट को मैंने ऊपर उठाया, गुलाबी ब्रा दिखी तो दिमाग चकरा गया। छाती तंग थीं, गोल भी। हाथ ब्रा पर फिरा, धीरे से दबाव डाला। निप्पल तुरंत खड़े हो गए। आवाज़ आई, “आह्ह… शैलेश… ऐसे नहीं… उइइ…”
अचानक मैंने जीं का बटन खोल दिया। नीचे उतारते ही सफेद पैंटी में उसकी चूत की आकृति स्पष्ट झलक रही थी। हाथ फेरा, तो पैंटी नम हो चुकी थी। एक तेज झटके के साथ खींचा, और कपड़ा फट गया। ब्रा भी अलग कर दी गई। अब वो मेरे सामने पूरी तरह नंगी थी। उसकी गोरी त्वचा, कसे हुए स्तन, गुलाबी निप्पल्स, और नीचे हल्के बालों से घिरी गुलाबी चूत। उसकी चूत से मछली-जैसी हल्की महक आ रही थी, जो मेरे दिमाग को और भड़का रही थी।
वो शरमाते हुए बोली, “अब तुम भी तो कपड़े उतारो… मुझे अकेले नंगा कर दिया।”
मैंने कपड़े एक साथ उतार दिए। मेरा लंड ऊपर को खड़ा हुआ था। उसकी नज़र पड़ते ही वो सहम गई, "ओय... इतना भारी... ये मेरे अंदर कभी नहीं समाएगा... मेरी चूत टूट जाएगी शैलेश... मत करो..."
मैंने हँसकर कहा, “आराम से करूँगा जानू, तुम बस मज़ा लो।”
उसे बिस्तर पर लिटाने के बाद मैंने उसकी जांघें थोड़ा अलग की। गुलाबी लब धीरे से अलग हुए, भीतर नमी साफ झलक रही थी। जीभ आगे बढ़ी, सिर्फ एक हल्का स्पर्श किया। अंदर से मीठापन छलक आया, बस। वो झुरझुरी सी बैठ गई, आवाज घबराई हुई - “आआह्ह… शैलेश… ऐसे मत करो… ओह्ह्ह… उइईई…”
जीभ तेज़ करके मैं चूत पर चप-चप करने लगा। वो सिसकने लगी, सिर को अपनी ओर खींचने लगी, "आह्ह… हाय्य… और चाटो… उम्म्म… ग्ग्ग…" दस मिनट में वो झड़ गई, रस मेरे मुँह में आया। सब कुछ मैंने निगल लिया।
मैंने अपना लंड उसके मुँह के पास ले जाकर रख दिया। शुरू में तो बचने लगी, लेकिन कुछ देर बाद हामी भर ली। सिर्फ इतने में कि चूसने लगी, और आवाज़ें आने लगी - ग्ग्ग्ग… गी गी गी… गों गों… ऐसे लगा जैसे वो खुद को भूल गई हो। मुझे डर लगा कहीं निकल न जाए, तो मैंने छुड़ा लिया।
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मैंने अपना लंड उसकी चूत पर रखा। फिर आगे बढ़ाया। सिर भीतर घुसा, और वह चीख उठी - “आआआह्ह्ह… मर गई… शैलेश, बाहर निकालो… तकलीफ हो रही है… उइइइईई…”
हाथ मुँह पर रखकर मैंने एक और तेज धक्का दिया। सारा लंड भीतर चला गया। आँसू आँखों से टपकने लगे, वो रो पड़ी। चूत से खून बहने लगा। मैं ठहर गया, फिर उसके बूब्स को चूसने लगा, मुँह पर मुँह रखा। धीरे-धीरे उसका डर कम हुआ।
थोड़ी देर बाद मैंने धक्के देना शुरू किया। अब उसे अच्छा लगने लगा। वह बोली, “अब सही है... धीमे हो जाओ... आह्ह... उमम्म…”
उसकी चूत इतनी तंग थी कि हर धक्के पर एहसास ऐसा मानो सब कुछ खत्म हो गया। मैंने गति तेज कर दी। वो भी अब झटके देने लगी, पिछवाड़ा ऊपर उठाकर, "हाँ... शैलेश... और मजबूत... आह... मेरी चूची फाड़ दे... आज सब कुछ दे दे... ओह... हाय... ऊऊऊ..."
एकदम अचानक मैंने तेजी से चोदना शुरू किया। घर के अंदर सिर्फ उसकी आवाजें और मेरी गति सुनाई दे रही थी। थोड़ी देर में मैं खुद को समेट नहीं पाया, फिर भी रुका नहीं। वो भी एक झटके के साथ लड़खड़ाई, उसके शरीर ने मेरे ऊपर कसकर प्रतिक्रिया दी।
थोड़ी देर बाद, हम दोनों खुले आसमान के नीचे पड़े थे। उसके होठों पर मुस्कान थी, जब वह बोली - “अब मैं सिर्फ एक लड़की नहीं रही।”
बाथरूम जाकर साफ हुई तो मैंने उसे गले लगाया। वो दिन हमारी ज़िंदगी का सबसे हॉट दिन था।ंंं
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