Chupachaap Rahane Vaalee Devar, Saath Mein Pados Kee Bahan.
एक लड़का था, घर पर कम ही बोलता। उसकी भाभी आई, तो माहौल बदल गया। उनकी नज़रें मिलीं, फिर बातचीत शुरू हुई। एक दिन वह भाभी हंसते हुए उठी, उसके पास जाकर बोली – "तुम्हारा नंबर चाहिए"। लड़का झेंप गया, पर बोल दिया। फिर एक शाम वहीं छत पर मिले, हवा चल रही थी। धीरे-धीरे कपड़े ढीले हुए, सांसें तेज़ हो गईं। कोई नहीं जानता था कि वहाँ क्या हुआ, बस चांद ऊपर था।.
उस वक्त मेरी बी.ए. की पढ़ाई चल रही थी, यह बात मेरे साथ और एक भाभी के साथ घटित हुई।
एक असली वाकया की बात हो रही है।
उसकी बात करूँगा सबसे पहले।
नीचे कोई लड़की है, उसका नाम निशा है।
एक ऐसी महिला जो नज़र आते ही ध्यान खींच लेती है, उसकी छवि में कुछ खास बात है। लोग उनकी ओर मुड़ जाते हैं, बिना सोचे।
मुझे उनके बारे में सोचकर कोई बुरा अहसास नहीं हुआ।
उस दिन की बात है, एक शादी में पहली बार आपस में जुड़े थे हम दोनों।
बस मुलाकात हुई, और अगले पल कुछ खास नहीं घटा।
मन में क्या चल रहा था, समझो तो समझो। इतनी गर्मी कि धीरज बचाना हर किसी के बस की बात नहीं थी।
शरीर के तले हिलोर उठते थे, 34″-32″-36″ के आकार में फैला वो बदन कपड़ों से बाहर झाँक रहा था।
लगता था, जैसे उनकी जवानी कपड़ों के बिना सांस लेना चाहती हो।
दो ऊँचे उभार जैसे पहाड़ खड़े थे, पीछे की तरफ से भी धमाकेदार शोर मच रहा था।
उसका रिश्ता मुझसे ऐसा बन पड़ा था, जैसे वो मेरी भाभी हों।
देखने में मैं काफी तगड़ा लगता हूँ। मेरा बदन मजबूत है, ऊंचाई में भी कोई कसर नहीं।
Xxx की कहानी तब शुरू हुई, जब देवर-भाभी एक बिहे में मिले।.
एक शादी का मौका था, सब कुछ धीरे-धीरे अपने हिसाब से आगे बढ़ रहा था।
हर कोई जहाँ भी वो महिला गुज़रती, उसकी ओर देखने लगता।
एक कोने में हम सभी इकट्ठा बैठे थे।.
फिर अचानक निशा भाभी चाय के साथ दिखाई दीं।
चाय बांटते हुए वह मेरे सामने अजीब तरह से झुक पड़ीं।
कभी समझ नहीं आया… मैं तो बस इतना घबराया हुआ, धीमे आवाज़ वाला लड़का था।
तुरंत मेरी नजर जमीन पर टिक गई।
हो सकता है वही उसने चाहा था - मुझे नजरअंदाज किए बिना, मैं सब पर भारी पड़ रहा था।
फिर भी मैं काफी संकोची था।
चलते समय उनका धड़ इतना हिल रहा था कि लग रहा था, कपड़े अब रोक नहीं पाएँगे।
गुलाबी रंग की पारदर्शी साड़ी-ब्लाउज़ में वह खूब दमक रही थी।
सब कुछ तनावभरा दिखता था, मानो कपड़ों के पीछे छिपी युवावस्था काँप रही हो।
उसकी पीठ दिखते ही मन में डर सा उमड़ा।
जब वो चल रहे थे, तो पीछे से हिल रहा था कुछ ऐसा जैसे कोई बालटी में पानी भर रहा हो।
हर नौजवान के होठों पर लार टपकने लगी।
उसके पास भी अपनी मजबूत बातें थीं।
मोह देती थी सभी को, मगर किसी की पकड़ में नहीं आती थी।
ख़त्म होने का पल आया, शादी भव्यता के बीच समाप्त हुई।
जब मैं दूर जगह पढ़ रहा था, तभी वापस हॉस्टल आ गया।
एक सुबह अचानक कॉल बजी, जिसमें कोई परिचित नहीं था।
दूसरी तरफ से आवाज़ आई, “मैं निशा बोल रही हूँ, जो शादी समारोह में मिले थे!”
मुलाकात ज़रूर हुई थी, संवाद नहीं हो पाया उस वक्त।
मैंने कहा, “हाँ, मिले तो थे! बताइए!”
मैंने पूछा, “ये नंबर कहाँ से मिला आपको?”
उसने कहा, “चाहने वाले कहीं से भी ले लेते हैं!”
बातें होती रहीं, मैं और वो, एक के बाद एक।
कुछ समय बाद, हम दोनों के रिश्ते में पहले से ज़्यादा नजदीकी आ गई।
बातें छलकने लगीं, किसी ने सोचा ही नहीं था कि इतना कुछ कह देंगी।
शहर में काम का कोई मौका निकला, तब वो पहुँच गई थीं।
दुकान पर कपड़े सिलने का काम चलता, तो वो बीच-बीच में आ ही जातीं।
घर पहुँचा था मैं कुछ देर पहले।
उन्होंने कहा, “आज दुकान पर आ जाओ, कुछ ज़रूरी काम है!”
मैं मना नहीं कर पाया क्योंकि उन्होंने कहा, “आना ही होगा, नहीं तो फिर कभी बात नहीं करूँगी!”
तब क्या था, मुश्किल से गुजरना पड़ा।
सूरज ढलते-ढलते मैं वहाँ पहुँच गया।
उसकी नज़रें मुझ पर टिकी हुई थीं, साफ़ लग रहा था कि बस मेरे आने की उम्मीद थी।
आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे किसी बात का इंतजार था। मेरे दिखते ही वे मुस्कुरा उठीं।
उसके बाद, हम लोग होटल पहुँचे और वहीं खाना खाया।
उन्होंने कहा, “आज मेरी तरफ से पार्टी है!”
पूछ बैठा मैं - तब और कौन है, परिवार?
उसने कहा, “कोई नहीं रहता है यहाँ, मैं अकेली रहती हूँ!”
एक झगड़ा हुआ था उसके पति के साथ।
वो शख्स जिसे वो सबसे ज़्यादा भरोसा करती थीं, अचानक गायब हो गया।
एकांत में उसका समय बीतने लगा था।
बच्चे नाना-नानी के पास ही छोड़े गए थे, मायके में।
गाँव की ओर कदम उठते थे उसके हल्के-फुल्के पैरों से।
एक कमरा भी था, जहाँ वो ठहरती थीं, सिर्फ दुकान ही नहीं।
खाना खत्म हुआ, फिर हम वापस उसी कमरे में पहुंच गए।
जब वो पहुँचे, तो साथ में बियर के साथ-साथ अंडे भी थे, सिगरेट का डिब्बा जेब में था।
थोड़ा समय बाद वह अपने आस-पास के पुराने तरीकों से हटने लगी।
गेट को अंदर से बंद करते हुए वे कमरे में घुसे।
बिस्तर के किनारे हम धीरे से टिक गए।
उन्होंने कहा, “कपड़े बदल लो!”
कुछ लाने का सवाल ही नहीं था मेरे पास।
उधर मुड़कर वह कपड़े उतारने लगी।
उनकी डगमगाती नौजवानी को देखते ही, मेरा पंछी आसमान में खो गया।.
अचानक, वो अपने ऊपर नाइटी डालने लगी।
उन्होंने कहा, “अभी तक बदले नहीं?”
बस इतना ही कपड़े पहनकर मैं वहाँ खड़ा था, हाफ पैंट और बनियान में।
थोड़ी गर्मी के बाद उतारना अब तकलीफ सा लगने लगा।
भाभी ने कहा, “अब क्या शर्म? हम दोनों के अलावा कोई नहीं है यहाँ!”
उस शाम हल्की-फुल्की बारिश में, गपशप का सिलसिला चलता रहा।
कहानी सुनाते हुए आवाज़ में दर्द था।
काफी समय से उसका सेक्स नहीं हुआ था, इसलिए वह बहुत तड़प रही थी।
सिर पर कामवासना सवार हो गई थी उनके।
हवा में तपिश थी, पसीने से नम हो चुके थे वो।
पंखे को हमने चालू कर दिया।
इसके बाद, थोड़े समय में ही हम दोनों ने सारा कुछ समाप्त कर लिया।
उसके काँपते शरीर पर नाइटी देखकर मेरा लिंग तन उठा।
मगर रहा मैं एक सादे दिल वाला लड़का, कोई कदम उठाने से असमर्थ।
फिर भी, वो साफ़ तौर पर मुझे बेचैन कर रही थीं।
उसके दूध हल्के-हल्के डोल रहे थे, पीछे से धमाल मचा रही थी।
कभी हाथ नहीं डाला था, बस पर्दे पर देखा था।
पहले तो मुझे इसे देखकर बस हालत खराब हो गई।
उस महिला के पास जाते हुए दिल धड़क रहा था।
उसके बाद हम दोनों ने बिस्तर पर जगह बना ली।
थोड़ी देर के बाद वह मेरे ऊपर पैर रखकर हल्के से घिसटने लगी।
मैंने देखा कि उसकी पीठ मेरी ओर थी।
थोड़ा सा हिलते हुए नाइटी ऊपर को बढ़ गई।
मैंने उसकी नंगी जांघों को घूरा, फिर संभलने की कोशिश की। पर वश में नहीं हुआ कुछ।
उसने ऊपर की तरफ से पी लिया था।
पीछे से मैंने उनकी बेचैन जवानी का मज़ा लेना शुरू कर दिया।
फिर भी पहली बार कुछ ऐसा हो रहा था, मगर मैंने कई फिल्में पहले ही देख ली थीं।
उसकी लहराती छाती पर मेरा हाथ पड़ा, रात के सूट के ऊपर से दबाव डालते हुए।
सास ने धीमे से रोना शुरू किया, मुंह से एक हल्की सी "ऊऊऊ" आवाज़ निकल पड़ी।
हो सकता है, उसे इतने समय बाद एहसास हुआ था।
उस वक्त भाभी ने मेरा हाथ पकड़ लिया, धीरे-धीरे दबाव बढ़ाने लगीं। उनकी उंगलियाँ चमड़ी पर घिसटने लगीं, एक सिकुड़न सी छाती में आई।
उसकी उंगलियों ने मेरे हाथ को धीमे से खींचा, फिर वो कपड़ा फर्श पर आ गया।
अचानक वहाँ खड़ी थी - गोरी त्वचा, काले ब्रा और पैंटी में। "ओह... हाय!" मैंने सिसकते हुए कहा। एक झटके में सब कुछ तन गया, जैसे लोहे की छड़ बन गई हो।
अचानक भाभी ने मुझे जोश में आकर गले से लगा लिया।
थोड़ी देर बाद मैंने काम में हाथ बंटाना शुरू कियa।
थोड़ी देर बाद मेरा हाथ उनके ब्रा के भीतर सरक गया, वहाँ स्तनों पर दबाव डालने लगा।
अचानक से ऐसा लगा, जैसे कुछ अजीब हो रहा हो।!
उसकी ब्रा का हुक मेरे हाथ ने खोल दिया।
हथेली पर आज भाभी का सफ़ेद-सा गाढ़ा दूध लपटों की तरह फैल रहा था।
एक अचानक लड़खड़ाते कदम से मैं उन पर झपटा, जैसे कोई छोटा बच्चा होश खो बैठा हो।
दूध के घूँट के बीच में, भाभी के सिसकारों की आवाज़ फैल गई।
लगभग दस मिनट तक मैं ऐसे ही करता गया।
उसके नरम होंठों पर मेरा कदम बार-बार ठहरा।
गर्मी से भाभी का शरीर तपने लगा, मुंह से ‘आहह… उम्म्म…’ की ध्वनि खुद-ब-खुद फूट पड़ी।
इसके बाद मेरा ध्यान भाभी की पैंटी पर गया।
एक दिन ध्यान गया कि भाभी की पैंटी में से कोई अजीबो-गरीब महक आ रही है।
बारिश में खड़े होने के बाद उसका सिर पूरा तरबतर हो चुका था।
उसके निजी हिस्से से शायद कोई लिपटता सा पदार्थ बाहर आ रहा था।
उसकी पैंटी जब मेरे हाथ लगी, तभी कुछ चिपचिपा सा महसूस हुआ।
पहली बार किसी औरत के शरीर से होने वाला अनुभव मुझे मिल रहा था।
निशा भाभी की गीली चूत पर से पैंटी खिसकते हुए मैंने देखा।.
हाथ लपेटों में कुछ ऐसा छूट गया, पकड़ में जलवा सा आ गया।!
बहन के सिर पर घने काले बाल थे, मानो गाढ़ा तेल छिड़क दिया गया हो।
अचानक आँख पड़ी - वहाँ क्या था!
सिर पर हलचल महसूस हुई, तेजी से उठते बालों ने खींचाव दिया। भाभी के हाथ गर्दन के पास टिक गए, धक्कों से सिर आगे-पीछे होने लगा।
खुशबू ने मुझे अपने में समा लिया, वो भला-बुरा जाने।
अचानक से मेरी जीभ उसकी चूत के अंदर चली गई, फिर मैंने स्वाद लेते हुए चूसना शुरू कर दिया।
आवाज़ों में उनकी भाभी ने कामुकता भर दी।
मैंने जोर से काटना शुरू किया और वो कहने लगीं, “आज खा जाओ मेरी बुर को! बहुत खुजली हो रही है!”
मुंह से आवाजें फूट पड़ीं - “आहह… उउउउ… ईइइ”।
मेरा मुँह लगभग दस मिनट तक कुछ चखता रहा।
अचानक भीतर से तेजी से मक्खन की परत बाहर आने लगी।
भाभी का सब्र टूट गया। वो बोल उठीं - छोड़ दो मुझे, बस हो गया।
मैंने कहा, “ठीक है, जरा इसे भी तो गीला कीजिए!”
अचानक भाभी ने हाथ फंसाया मेरी चड्डी में, धीमे से खींचकर लौड़ा बाहर आया।
“ओह… माय गॉड! कितना बड़ा और मोटा है, और टाइट भी!”
उसने मेरा लंड अपने होठों में लिया, धीमे-धीमे चूसने लगी।
मुझे लगा कि शायद अब कुछ नहीं हो पाएगा, पर कुछ समय बाद वो मेरा चूसने लगीं, मैंने भी जवाब में उनका।
हर बार जब मैं चूसता, तो उनके शरीर का ताप और बढ़ जाता।
मैंने उनकी सांसों की तपिश को जीभ पर महसूस किया।
थोड़ी देर के बाद उनके मुँह से आवाज़ निकली, "ये अब झेला नहीं जा रहा, कृपया!"
बस इतना कहकर मैंने अपना लंड, जो पहले से ही खिंचा हुआ और सख्त था, उनकी बुर के ऊपर रख दिया। फिर धीरे-धीरे आगे-पीछे करना शुरू कर दिया।
उस देवर ने भाभी को चौंका दिया, तब वह और ज्यादा सनमग्म में पड़ गई।
“प्लीज़! प्लीज़!”
आहिस्ता-आहिस्ता मैंने भीतर जाना शुरू कर दिया।
कुछ देर तक अंदर नहीं जा पा रहा था। धीरे-धीरे जब थोड़ा घुस गया, तो भाभी मुस्कुराईं और बोलीं, "आराम से!"
फिसलता हुआ सा लगा, जब मैंने धक्का दिया तो लंड भाभी की नम चूची में घुसने लगा।
मन कर रहा था, जैसे किसी कोयले की चुलाई में छड़ डाल दी गई हो।
गर्मी ने ऐसा घेरा कि समझ में नहीं आया क्या हो रहा है। पल भर को लगने लगा, मानो कहीं ऊपर चला गया हूँ।
अचानक झटका लगा। "ओहह हह!" बोलते हुए लंड गहराई तक चला गया। भाभी की चूत में सब कुछ समा गया।
इसके बाद मैं आते-जाते रहने लगा।
कुछ पल बाद साँसों में छटपटाहट घुल गई।
गीली चूत से फच-फच करती आवाज़ आने पर झटके शुरू हो गए।
टांगें ऊपर कर लीं भाभी ने, धड़ाधड़ चढ़ाई गांड सारा लंड अंदर जाता हुआ।
तेजी से मैंने झटकों का बढ़ावा दिया।
वो “ऊय माँ… आह हहह… ईइइ इइइइ… ऊउउउ उउउ… ऊय ययय” करती गईं।
हर बार तेजी से मूव किया।
तब तक हवा इतनी सूखी हो चुकी थी कि पंखे की धड़कन भी बेकार लगने लगी।
कमरे में तेज़ सांसों की आवाज़ थी। पसीना बह रहा था, एक ने दूसरे के करीब होकर धीमे स्पर्श किया। गर्मजोशी बढ़ती गई। छुअन में लय थी। खुले मन से वे आगे बढ़े।
तीस मिनट के बाद हम दोनों से पूरा जम गया।
थोड़ी देर के बाद वह मेरे लिंग को ऊपर उठाए हुए अपने ऊपर बैठ गईं।
अपने हाथों से वह धीमे-धीमे छूने लगी।
तब हम उल्टा-सीधा, लेटकर, कई बार झपकी लेकर, हर पोज़िशन में सेक्स किया।
सबकुछ सिखाने वाली थीं भाभी।
आखिरकार वह बिस्तर पर एक पैर ऊपर उठाए हुए था।
अब हद पार हो चुकी थी।
पिचकारी मुझसे छूट गई।
बाहर खींचने की कोशिश की, तभी भाभी ने मना कर दिया, मजबूती से पकड़ लिया मुझे।
सारा वीर्य मेरे भीतर ही निकल गया।
उसी तरह हम सोते-सोते लंड भाभी की बुर में पहुँच गए।
आधे घंटे बाद जब आँख खुली, पता चला कि भाभी मेरे लिंग पर होठ फेर रही थीं।
खड़ा होते ही मैं आगे बढ़ गया, पल भर में वापस शुरू हो गया सब कुछ।
इस बार भाभी की गांड में जोर से घुसपैठ होती रही, उधर बुर की चुदाई में तेज़ी आई।
बार-बार वो मेरे शुक्रांश को अपने भीतर समेट लेती थीं।
सुबह के चार बजने तक यही हरकतें चलती रहीं।
थकावट में ढलते ही दोनों का बिस्तर पर नींद आ गई।
आँख खुलते ही साढ़े सात का समय था, फिर मैंने पलंग पर पड़ी भाभी को धक्का दिया।
इसके बाद, नहाने के बाद हम दोनों साफ़ हो चुके थे।
घर की ओर कदम बढ़ाते हुए मैंने देखा, भाभी तो दुकान की तरफ जा रही थीं।
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